दक्षिण एशिया में शांति के प्रयास और मीडिया

दक्षिण एशिया में शांति को बढ़ावा देने में मीडिया की भूमिका विषय पर चंडीगढ़ में 8-12 अप्रैल 2016 को आयोजित सेमिनार में दिया गया भाषण

    प्रबोध जमवाल

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत और पाकिस्तान के मीडिया, जिसमें खबरिया चैनल भी शामिल हैं, ने दक्षिण एशियाई देशों में शांति एवं लोकतंत्र की भावना को बढ़ावा देने में अवरोधक की भूमिका निभाई है। शांति के प्रयासों को बढ़ावा देने की बजाय मीडिया की भूमिका अंधराष्ट्रवाद की आग में घी डालने वाली है। असल में, भारत और पाकिस्तान में आतंकवाद संबंधी कुछ घटनाओं में मीडिया ने अति राष्ट्रवादी ताकतों के जाल में फंसकर जिम्मेदारीपूर्ण रिपोर्टिंग से किनारा कर लिया है। यह कोई नई प्रवृत्ति या घटना नहीं है और न ही यह सिर्फ दक्षिण एशियाई देशों तक सीमित है।

दुखद यह है कि अंधराष्ट्रवादी तरीके से काम करने की वजह से मीडिया भारतीय और पाकिस्तानी सरकारों के हाथों का एक औजार बन गया है। मौजूदा हालात में दोनों देश और अति-राष्ट्रवादी ताकतें मीडिया का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हित साधने तथा संकीर्ण राजनीति को बढ़ावा देने में करते हैं। ज्यादातर मामलों में दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी राजनीतिक दल, जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं। ये राजनीतिक दल सामाजिक और आर्थिक विकास के मुद्दों का इस्तेमाल भी अपने हित साधने में करते हैं। इन परिस्थितियों के चलते दक्षिण एशिया में गरीबी और असल विकास जैसे सभी बड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग का दायरा सिमटता जा रहा है। लोकहित के लिए स्वतंत्र अखबारों का काम करना दुभर हो गया है। यह बताना मुनासिब होगा कि जो पत्रकार शांति प्रक्रिया के लिए सक्रिय और सही मायने में शामिल हैं और मैत्रीपूर्ण रिश्तों को बढ़ावा देकर दोनों तरफ सामाजिक उत्साहवर्द्धन कर रहे हैं, उनके लिए स्वतंत्र रूप से अपना दायित्व निभाने में मुश्किलें आ रही हैं।

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यहां कुछ घटनाओं का जिक्र करना जरूरी है। 2008 में 26/11 मुंबई हमले में भारत और पाकिस्तान की मीडिया रिपोर्टिंग बहुत संकीर्ण थी। दोनों देशों का मीडिया अंधराष्ट्रवाद में डूबकर इस मामले को रिपोर्ट कर रहा था। जैसे लग रहा था कि दोनों देश मीडिया के जरिये युद्ध लड़ रहे हैं। इसी तरह पठानकोट एयरबेस पर हमले के दौरान 1 जनवरी 2016 के दिन मीडिया एक बार फिर इसी जाल में फंस गया। भारत की कई सुरक्षा एंजेसियों की भूमिका संदेहास्पद रही है। कुछ ही मीडिया समूह ऐसे हैं जो घटना की जांच खुद करते हैं। इस मुद्दे पर सूचना और पठानकोट हमले की विस्तृत जानकारी के लिए सुरक्षा एजेंसियों पर खालिस निर्भरता को लेकर मीडिया की तीखी आलोचना हुई। सुरक्षा प्रतिष्ठानों ने पत्रकारों को गलत जानकारी दी।

पत्रकार इसी समाज का हिस्सा होते हैं। ऐसी स्थिति में ज्यादातर पत्रकारों के लिए पीछे हटना मुश्किल होता है और उसको बड़े परिप्रेक्ष्य में देखने लगते हैं, खासकर जब उनके देश पर हमला हुआ हो। पत्रकारों की जिम्मेदारीपूर्ण रिपोर्टिंग और टिप्पणी में उनके विचार व राजनीतिक सोच तो झलकती है लेकिन कम से कम हम उम्मीद कर सकते हैं कि वह अपने विषय, अपने दर्शकों/पाठकों के साथ न्याय करेंगे। और शायद राष्ट्रीय पहचान की बजाय मानवता को प्रमुखता देंगे। भारतीय और पाकिस्तानी पत्रकारों की आलोचना करते हुए रीता मनचंदा का कहना है कि मीडिया में किसी मुद्दे के साथ जोड़-तोड़ प्रत्यक्ष सेंसरशिप से ज्यादा मिथकों और अपनी सोच का घालमेल है।

यदि भारतीय मीडिया राष्ट्रवादी है और अपनी सरकार पर भरोसा करता है तो पाकिस्तान की सरकार के नुमाइंदों ने भी पाकिस्तानी मीडिया का मुंह तोड़ देने के लिए उन पाकिस्तानियों को उकसाया जिनकी प्रवृत्ति नुक्ताचीनी की है। पाकिस्तान के मीडिया की सीमाओं को भी पेशावर के अनुभवी पत्रकार रहिमुल्ला युसूफजई के इस कथन से भी समझा जा सकता है। युसूफजई के अनुसार पाकिस्तानी पत्रकारों को पेशेवर तरीके से 1965 और 1971 के युद्धों और कच्छ के रण विवाद तथा कारगिल युद्ध को कवर करने का अवसर नहीं मिला। बलूचिस्तान के संघर्ष और उत्तरी क्षेत्रों को भी कवर करने का मौका नहीं मिला।

इसी प्रकार, टेलीविजन चैनलों पर बातचीत के दौरान एंकर युद्धोन्मादी बात करते हैं, जिसे आप चुनौती नहीं दे सकते। हाल ही का एक उदाहरण बताते हैं, एक सेवानिवृत्त आर्मी जनरल ने भारत का उल्लेख पाकिस्तान के दुश्मन मुल्क के तौर पर किया। खबरिया चैनलों में संतुलित बात करने वाले टिप्पणीकारों को बुलाया तो जरूर जाता है, लेकिन उन्हें बोलने का मौका बहुत कम दिया जाता है। विश्लेषक फोकिया सादिक खान कहते हैं कि पाकिस्तानी मीडिया उस चीज को जरूर दिखाता है जिसमें फिल्मकार महेश भट्ट भारतीय मीडिया की आलोचना करते हैं, लेकिन वह अपने ही मुल्क में हो रहे पाकिस्तानी मीडिया की आलोचना को कभी नहीं दिखाता है। पाकिस्तानी मीडिया मुस्लिम होने के कारण मुंबई में फ्लैट नहीं मिलने पर शबाना आजमी का बयान चलाता है लेकिन रूढ़िवाद पर उनकी राय नहीं लेता है।

बाबरी मस्जिद का विध्वंस, परमाणु परीक्षण और कारगिल लड़ाई के दौरान दोनों तरफ से अंधराष्ट्रवादी पत्रकारिता हुई। कभी-कभी पत्रकारों की चूक आयोग की चूक से ज्यादा दोषपूर्ण होती है- जैसे कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं की अनदेखी करना, कुछ पहलुओं को कम करके दिखाना और महत्वपूर्ण सवालों को नहीं पूछना।

मुंबई हमले की भयावह घटना से हुए अनुभव के कई उदाहरण हैं। कल्पना शर्मा तहलका में भारतीय मीडिया की पहले 60 घंटों की कवरेज की आलोचना करते हुए कई दृश्यों को खोलती हैं। वह लिखती हैं, “यह जरूरी है कि पत्रकारों को असाधारण स्थितियों को कवर करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाए और वे संयम के महत्व को सीख सकें तथा तथ्यों की दोबारा जांच कर सकें… पेशेवर रुख और सटीकता ही यह सुनिश्चित करेगी कि हम पूर्वाग्रह और अफरा-तफरी बढ़ाने वाले तत्वों का साथ तो नहीं दे रहे हैं।”

कुछ भारतीय चैनल पाकिस्तानी फैक्टर दिखाने के लिए फिल्म का ट्रेलर चलाते हैं। यह स्पष्ट रूप से पाकिस्तान की नाराजगी को बढ़ाता है। हालांकि भारतीयों के दर्द और दुख को महसूस करने वाले पाकिस्तानियों को दिखाकर इस नाराजगी को संयमित किया जा सकता है। टिप्पणीकार उस समय को याद कर सकते हैं, जब उनके मीडिया घरानों ने उस मुद्दे को किस तरह सनसनीखेज बनाया था।

पत्रकार यह तर्क दे सकते हैं कि वे सिर्फ संदेशवाहक हैं और सरकार व जनता की राय को दिखाते हैं। लेकिन मीडिया हमेशा सवाल उठता है और लोग उस पर सोचते हैं। हमारे परमाणु हथियारों से लैस देशों में 9/11 के बाद जहां बड़े खिलाड़ी हथियारों के खेल में शामिल रहे हैं और अलकायदा तथा तालिबान की विचारधारा को खड़ा करने वाली दुनिया के इर्द-गिर्द सोचने के लिए हमें प्रशिक्षित किया गया।

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जहां तक, मेरे अखबार का मामला है कश्मीर टाइम्स प्रकाशन, वह जम्मू-कश्मीर में अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं के चार अखबारों का प्रकाशन करता है। यह प्रकाशन शुरू से ही स्वतंत्र रिपोर्टिंग को बढ़ावा देने, सभी तरह की हिंसक घटनाओं की जांच पड़ताल, शांति प्रक्रिया को बढ़ावा देने का काम करता रहा है और समतावादी समाज के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन जब से इसकी शुरुआत हुई है यह भारतीय सरकार के निशाने पर है। संस्था द्वारा एक संघीय लोकतांत्रिक देश की कल्पना की गई, जहां विकेन्द्रित लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सिर्फ असहमति को जगह ही नहीं दी जाती है बल्कि उसका सम्मान भी किया जाता है। जीवंत लोकतंत्र में देश के लोगों को विचार-विमर्श के माध्यम से बहस करने के लिए जगह दी जाती है।

अति राष्ट्रवादी ताकतें, संकीर्ण सोच वाले दक्षिणपंथी समूह इन सिद्धांतों और वसूलों को निशाना बना रहे हैं। सरकार की ओर से स्वतंत्र आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। भारत और पाकिस्तान के बीच शांति को बढ़ावा देने, नियंत्रण रेखा पर कुछ और रास्तों को खोलने ताकि लोगों के बीच संपर्क-संबंध बढ़ें तथा विभाजित कश्मीर के दोनों हिस्सों के बीच व्यापार हो सके, इसके मद्देनजर अक्टूबर 2004 में कश्मीर टाइम्स प्रकाशन के पत्रकार पहली बार पाकिस्तानी मीडिया के प्रतिनिधियों से मिले थे। लेकिन तभी से भारत सरकार की तरफ से कश्मीर टाइम्स प्रकाशन को मिलने वाले वाजिब सरकारी विज्ञापनों से इसे मरहूम कर दिया गया है।

कश्मीर टाइम्स प्रकाशन ने 2011 में भारत-पाकित्सान के बीच व्यापक बातचीत को फिर शुरू करने का एक प्रयास किया, ताकि दक्षिण एशियाई देशों में शांति और लोकतांत्रिक हितों को बढ़ावा दिया जा सके। लेकिन इस प्रकाशन को निशाना बनाया गया और यह प्रवृत्ति निरंतर बनी हुई है। भारत सरकार ने अभी तक विज्ञापन की सूची से सिर्फ कश्मीर टाइम्स प्रकाशन को ही बाहर रखा हुआ है।

*प्रबोध जमवाल, 1999 से कश्मीर टाइम्स प्रकाशन के संपादक हैं। वह पाकिस्तान-इंडिया फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी (पीआईएफएफपीडी) में तब से सक्रिय हैं जब इसकी स्थापना 1993 में हुई थी। वह 2000 में स्थापित साउथ एशियन फ्री मीडिया एसोसिएशन (साफमा) के संस्थापक सदस्य हैं।

*अंग्रेजी से अनुवाद- संजय कुमार बलौदिया (जनमीडिया के सितम्बर 2016 अंक में प्रकाशित भाषण)

न्यूज चैनल हर घंटे कश्मीर को भारत से दूर ढकेल रहे हैं

शाह फैसल

मेरे एक साल के बच्चे के लिए 13 जुलाई 2016 की दोपहर में सोना मुहाल हो गया था। इलाके में कर्फ्यू लगा था और नजदीक की सड़क पर तड़के से ही आजादी के नारों और आंसू गैस के गोलों के धमाकों की भयावह जुगलबंदी चल रही थी। संघर्ष के क्षेत्र में हिंसा से परिचय बच्चे की शिक्षा का हिस्सा होता है। इस पल मेरे बच्चे पर कश्मीरी होने का का ठप्पा लगाया जा रहा था। खतना होने और आधिकारिक तौर पर मुस्लिम करार दिए जाने से पहले ही उसके कोमल दिमाग पर इतिहास अंकित हो रहा था। उसके अवचेतन पर इस्लाम से भी पहले कश्मीर ने दस्तक दे दी थी। तीन दशक पहले कुछ ऐसे ही पलों में हमारे घर के पिछवाड़े पहाड़ियों पर मोर्टार के गोलों की बरसात हो रही थी और मेरे पिता सुलाने के लिए मुझे थपकियां दे रहे थे। उस दोपहर एक दफा फिर घाटी के अतीत और वर्तमान का पूर्व परिचित खूनी मिलन हो रहा था। मौका 85वां शहीद दिवस का था। मगर इस बार सड़कों पर अशांति की शुरुआत असामान्य थी। इस अशांति के लिए चिंगारी का काम 8 जुलाई 2016 को कोकरनाग में एक नौजवान उग्रवादी कमांडर की मौत ने किया था।

उसी वक्त किसी अनजान शख्स ने टेलीफोन पर मुझे बताया कि जी न्यूज कश्मीर के मौजूदा संकट पर दो दिनों से मैराथन चर्चा चला रहा है। वह कश्मीर के मृत और जीवित नौजवान उग्रवादियों के बरक्स मेरी तस्वीरों और वीडियो को आदर्श के तौर पर पेश कर रहा था। मैं काफी परेशान हो गया। इसकी वजह सिर्फ इस समाचार चैनल की असंवेदनशील और छिछला तौर-तरीका ही नहीं था। उसकी इस करतूत ने मेरी जान को भी जोखिम में डाल दिया था। मुझे हैरानी थी कि 50 हजार रुपल्ली की मासिक पगार और 50 लाख रुपये के मकान के कर्ज के साथ मैं कश्मीरी युवाओं की कामयाबी की मिसाल कैसे हो सकता था।

कश्मीर में महानता का एकमात्र पैमाना आपके जनाजे में शामिल लोगों की संख्या है। ऐसे में कोई भी 50 हजार रुपये के लिए अलग-थलग पड़ कर मरना क्यों चाहेगा। मेरा भय सही साबित हुआ। मुझे बताया गया कि हमारे मुहल्ले के बाहर भारी भीड़ जमा है। भीड़ में शामिल लोग जी न्यूज के एंकर की इस टिप्पणी से नाराज थे कि मृत उग्रवादियों को भारत की धरती में दफनाने की बजाय कूड़े के साथ जला दिया जाना चाहिए। स्टूडियो और सड़क उन्माद में एक-दूसरे से होड़ कर रहे थे।

अगले दिन मैं कुर्ता-पायजामा और किसानों जैसी टोपी में अपनी पहचान छिपाए दफ्तर के लिए  निकला। मैं जांच चैकियों से चोरों की तरह निकल रहा था। मैं जानता था कि नाराज नौजवानों के किसी झुंड ने मुझे पहचान लिया तो मेरी खैर नहीं है। आखिर मैं इस नाजुक मोड़ पर कश्मीरी और भारतीय के बीच होड़ में गलत पाले में जो पड़ गया था। मेरे फेसबुक वॉल पर हुई मेरी लानत-मलानत मेरे इस डर की तस्दीक कर रही थी।

पिछले कुछ बरसों से राष्ट्रीय मीडिया का एक तबका एक व्यावसायिक रणनीति के तहत भारत की अवधारणा को कश्मीर में गलत ढंग से पेश कर रहा है। वह देश के बाकी हिस्सों में भी कश्मीर के बारे में झूठ फैला रहा है। इस बहस के झुकाव और समय को लेकर हैरानी की बात कुछ भी नहीं है। वह 2008-2010 और 2014 में भी ऐसा ही कर चुका है। मौजूदा समय में कश्मीर पर लगभग सभी कार्यक्रमों का मकसद अवाम में उत्तेजना फैलाना है। इस मनमाने कवरेज के पीछे का इरादा राज्य सरकार के लिए परेशानियों को बढ़ाना लगता है। इसके विपरीत प्रिंट मीडिया ने अपना संतुलन हमेशा बनाए रखा है।

इन कुछेक समाचार चैनलों की व्यावसायिक क्रूरता वाकई बेहद दुखद है। लोग मर रहे हैं और सरकार अवाम की भावनाओं को शांत करने की पुरजोर कोशिश में लगी है। लेकिन ये चैनल लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की सरासर अनदेखी करते हुए झूठ को बढ़ावा देकर नागरिकों को बांटने और नफरत फैलाने में जुटे हैं। शांति की अपीलों का भी इनकी मुहिम पर कोई असर नहीं पड़ता। टीआरपी को राष्ट्रीय हित के तौर पर बेचने और नौजवानों की लाशों पर कारोबार करने की यह बेशर्मी इन भद्दे न्यूज रूमों का सबसे गंदा पहलू है।

कश्मीर को परे हटा कर देखें तो भी भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय हितों को राष्ट्रीय मीडिया से आजाद कराने तथा पड़ोसियों और अवाम के साथ संवाद की बहाली की है। मुझे यह कहते हुए जरा भी हिचक नहीं है कि जी न्यूज, टाइम्स नाउ, न्यूज एक्स और आजतक उस मुहिम की अगुवाई करते हैं, जो भारत को संवाद पर आधारित सभ्यता से एक मूर्खतापूर्ण और अतार्किक समाज में तब्दील कर देगा।

भारतीय परंपरा के अनुसार राजसत्ता का जनता से संवाद उग्रता और हिंसा के बजाय आपसी समझ और कल्याण के जरिये होना चाहिए। सम्राट अशोक ने अपनी प्रजा के साथ संवाद के लिए स्तंभों और शिलालेखों का सहारा लिया था। मुगलकाल में भी दीवाने आम राजसत्ता और रियाया के बीच सीधे संवाद का प्रतीक था। फरमान आज की तरह भांड़ और चारण नहीं बल्कि सिर्फ शासक ही जारी कर सकता था। इस्लामी परंपरा में भी संवाद के केंद्र में सच्चाई, संयम और लगन ही है। भारतीय और इस्लामी अनुभूतियों के संगम कश्मीर को भी ईमानदारी, सच्चाई और बेबाकी की दरकार है। समाज को बांटने वाला संवाद भारत के हितों को ही और कमजोर करेगा।

मौजूदा अशांति के कारणों की पड़ताल करते समय हमें इस पर भी गौर करना चाहिए कि किस तरह हमने संवाद को सिर्फ उकसाने और अलगाव फैलाने में दिलचस्पी रखने वाले टेलीविजन चैनलों के हवाले कर दिया है। भारतीय शासन कश्मीर को बौद्धिक गद्दारों, राजनीतिक दलबदलुओं, अवसरवादियों, खुफिया एजेंसियों और राष्ट्रीय हित के स्वघोषित पहरेदारों के हाथों में छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकता।

कश्मीरियों के लिए राष्ट्रीय मीडिया की घृणित संपादकीय नीति और सरकार की दमनकारी नीतियों में फर्क कर पाना अक्सर कठिन होता है। टेलीविजन चर्चाओं में कश्मीर के प्रतिनिधियों पर धौंस जमाया जाना, कश्मीरियों की आकांक्षाओं का मजाक उड़ाना और उनकी परेशानियों को शोर-शराबे में दबा देना आम बात है। टीवी चैनल बेगुनाहों के कत्ल पर मामूली मुद्दों को तरजीह देने के अलावा आम आदमी की पीड़ा को दिखाने के बजाय सैनिकों की बहादुरी का गुणगान  करते हैं। राज्य सरकार की सकारात्मक पहलकदमियों को नजरंदाज करने वाले ये चैनल सच को नहीं दिखाते और इन पर कश्मीरी जनता की तुलना में गाय को ज्यादा महत्व दिया जाता है। ऐसे में कश्मीरियों की निराशा और भारत के खिलाफ नाराजगी स्वाभाविक है। प्राइम टाइम टेलीविजन समाचारों के आक्रमण का हर घंटा कश्मीर को भारत से एक मील पश्चिम की ओर खिसका देता है।

संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मिली गारंटी की वजह से नफरत की पत्रकारिता के इन ठेकेदारों का मुंह बंद करना या इनके खिलाफ हस्तक्षेप करना आसान नहीं है। लेकिन देश की एकता और अखंडता का मसला इससे कहीं बहुत बड़ा है। हमें दिल्ली और श्रीनगर के बीच संवाद के मूल, पारंपरिक और अतिरिक्त माध्यमों को बहाल करना होगा, जो शोर-शराबे और नाराजगी को घटा कर न्यूजरूम राष्ट्रवादको अप्रासंगिक बना सके। इसके अलावा हमें इन मीडिया घरानों को समझाना होगा कि उन्हें जमीनी हकीकत पर गौर करते हुए अपने युद्धोन्मादी आडंबर को घटाना चाहिए।

श्रीनगर के युवा आपको बता सकते हैं कि भारत किस तरह पिछले बरसों में कश्मीरियों से धांधली प्रभावित चुनावों, निर्वाचित सरकारों की बर्खास्तगी, मुठभेड़ों और भ्रष्टाचार के जरिये संवाद करता रहा है। वे बताएंगे कि किस तरह भारत सेना के बंकर, पुलिस की गाड़ी या प्राइम टाइम टेलीविजन पर गरजने वाले लफ्फेबाजों का पर्यायवाची बन गया है। क्या इस तरह का भारत कश्मीरी दिलों को जीत सकता है। कश्मीरी अवाम भारत और उसके प्रतीकों को किस नजर से देखती है उसे स्वीकार करना इस पेचीदा पहेली को हल करने की दिशा में पहला कदम होगा।

कश्मीरी बहुत संवेदनशील होते हैं। इसके अलावा संदेह करना भी उनकी फितरत है। उनसे बातचीत गर्मजोशी के माहौल में और अहसान के बजाय बराबरी के स्तर पर हो, तभी वह कामयाब होगी। मौजूदा प्रधानमंत्री ने अकेले दम पर दुनिया भर में भारत की छवि को रौशन किया है। उन्हें कश्मीर में भारत की छवि बदलने का काम भी अपने हाथों में लेना चाहिए।

लेखक- भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और जम्मू कश्मीर में स्कूली शिक्षा के निदेशक हैं।

अंग्रेजी से अनुवाद- पार्थिव कुमार

जनमीडिया के सितम्बर अंक में प्रकाशित लेख

इंटरव्यू पत्रकारिता और नरेन्द्र मोदी

 

अनिल चमड़िया

अभिव्यक्ति की कई विधाओं में पत्रकारिता भी एक है। कहानियों, कविताओं, नाटकों आदि की प्रस्तुति का कोई एक निश्चित ढांचा नहीं है। कहानियां, कविताएं, नाटक कई तरह से प्रस्तुत किए जाते हैं। पत्रकारिता की विधा में भी प्रस्तुति के कई रूप व शैली हैं। समाचार, विश्लेषण, सूचना, टिप्पणी आदि प्रस्तुति के रूप व उन रूपों की अपनी भाषा-शैली है। जिस तरह कहानियों और कविताओं के लिए मूलभूत तत्व अनिवार्य हैं, उसी तरह पत्रकारिता के मूल में देश दुनिया के बीच निरंतर संवाद की स्थिति बनाना है।

पत्रकारिता में प्रस्तुति के विभिन्न रूपों में इंटरव्यू बेहद लोकप्रिय है। इंटरव्यू दो लोगों के बीच संवाद का एक दृश्य जरूर तैयार करता है लेकिन वास्तव में वह दो ही लोगों के बीच सवाल और जवाब नहीं होता है। इंटरव्यू में सवाल करने वाले मीडिया (जनसंचार माध्यम) के प्रतिनिधि होते हैं लेकिन वे सवाल उनके निजी नहीं होते। वे दर्शकों, पाठकों व श्रोताओं के सामाजिक-राजनीतिक सवालों के प्रतिनिधि होते हैं। बल्कि इसका भी विस्तार होता है। जिनका इंटरव्यू करते हैं उसके विषय और उससे जुड़े लोगों के वे बतौर प्रतिनिधि भी होते हैं। इंटरव्यू में राजनीतिक इंटरव्यू का महत्व अधिक होता है क्योंकि राजनीतिक घटनाक्रम सभी को एक साथ सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं।

पत्रकारिता में अभिव्यक्ति के लिए जिन रूपों को विकसित किया गया है उनमें राजनीतिज्ञों से इंटरव्यू का प्रचलन लोकतंत्र के विस्तार के साथ ही बढ़ता रहा है। यदि पत्रकारिता में अभिव्यक्ति के विभिन्न रूपों के काल और उनके प्रचलन की स्थितियों का अध्ययन करें तो उसकी पृष्ठभूमि में सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों में तत्कालीनता का प्रभाव दिख सकता है। उदाहरणस्वरूप भारत के 1974 के छात्र आंदोलन, इंदिरा गांधी के आपातकाल के फैसले और उसके विरुद्ध आंदोलन के विस्तार के बाद पत्रकारिता में आए कुछ मूलभूत बदलाव को देखा जा सकता है।1 उस आंदोलन ने पत्रकारिता से पाठकों की अपेक्षा बढ़ा दी। पत्रकारिता में कई नये प्रकाशन शुरू हुए और वे भी अभिव्यक्ति के नए रूपों के साथ हुए और उनमें उसी अनुपात में सरोकार का भी विस्तार दिखता है। यानी एक तरह की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियां पत्रकारिता को गहरे रूप में प्रभावित करती हैं। पत्रकारिता में अभिव्यक्त करने के नए रूप सामने आते हैं। लेकिन इसका ये अर्थ कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि नया रूप वृहतर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सरोकारों से युक्त ही हो। नये रूप, नए तरह के सरोकारों से युक्त होते हैं और वह सरोकार तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव और स्थितियों के अनुसार तय होता है।

इस अध्ययन को पूरा पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें –

इंटरव्यू पत्रकारिता अंक-44

स्टिंग ऑपरेशन और न्यूज रूम की संस्कृति

मुजफ्फरनगर दंगों के स्टिंग ऑपरेशन के संबंध में उत्तर प्रदेश विधानसभा द्वारा गठित जांच समिति के समक्ष चैनल के संपादकीय व प्रबंधकीय अधिकारियों ने जो साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं उससे टी वी चैनलों के न्यूज रूम के भीतर  के कामकाज की संस्कृति जाहिर होती है। दिनांक 17 सितम्बर 2013 को “आज तक” एवं “हेड लाइन्स टुडे” चैनलों पर मुजफ्फरनगर दंगों के विषय में प्रसारित किये गये स्टिंग ऑपरेशन में सदन के एक वरिष्ठ मंत्री मोहम्मद आजम खां के विरुद्ध लगाये गये आरोपों के परिप्रेक्ष्य में यह जांच समिति गठित की गई थी। हम जांच समिति के प्रतिवेदन के उस संपादित अंश को प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें न्यूज रूम के भीतर के कामकाज की संस्कृति उजागर होती है। पाठक की सुविधा के लिए भाषा के स्तर पर भी संपादित किया गया है।

दिनांक 17 सितम्बर 2013 को “आज तक” एवं “हेड लाइन्स टुडे” न्यूज चैनल पर क्रमशः “ऑपरेशन दंगा” एवं “Operation Riot for Vote” शीर्षकों के अन्तर्गत मुजफ्फरनगर दंगों के विषय में टी.वी. टुडे नेटवर्क द्वारा सम्पादित किये गये स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित किया गया। “आज तक” चैनल पर दिनांक 18 सितम्बर, 2013 को “ऑपरेशन ‘दंगा’ पार्ट-2” प्रसारित किया गया।

मुजफ्फरनगर में तत्समय तैनात विभिन्न अधिकारियों के स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर इन प्रसारणों में यह दर्शाया गया कि दंगों के मुख्य संदिग्धों को राजनैतिक दबाव के कारण रिहा कर दिया गया, जिसके कारण यह दंगे भड़के। प्रसारण में यह भी दिखाया गया कि मुजफ्फरनगर के तत्कालीन जिलाधिकारी द्वारा कतिपय संदिग्धों की तलाशी लेने के कारण उनका स्थानान्तरण कर दिया गया। स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर प्रसारण में यह प्रदर्शित किया गया कि मुजफ्फरनगर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक द्वारा यह माना गया कि दंगों के पीछे राजनीति थी। प्रसारण में यह भी प्रदर्शित किया गया कि कतिपय राजनैतिक व्यक्तियों द्वारा दबाव के अन्तर्गत दंगों की प्रथम सूचना रिपोर्ट को संशोधित करवाया गया।

मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में दिनांक 27 एवं 28 अगस्त, 2013 को हुयी घटना के विषय से जुड़े प्रसारण में यह दर्शाया गया कि जानसठ तहसील के उपजिलाधिकारी आर.सी.त्रिपाठी तथा क्षेत्राधिकारी पुलिस जे.आर.जोशी ने यह खुलासा किया कि राजनैतिक साजिश के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट इस प्रकार से संशोधित की गई जिससे कि दंगों के मुख्य आरोपी छूट जायें तथा यह कि मुख्य संदिग्धों, जिनको कि दिनांक 27, अगस्त 2013 को गिरफ्तार किया गया था, को ऊपर से राजनैतिक दबाव के कारण रिहा कर दिया गया। इन प्रसारणों में इस पर बल दिया गया कि मुजफ्फरनगर जनपद के फुगाना थाने में तैनात सेकेण्ड ऑफिसर के अऩुसार उत्तरप्रदेश सरकार के एक बड़े नेता द्वारा दंगों में गिरफ्तार किये गये मुख्य आरोपियों को रिहा करने के निर्देश दिये गये थे। प्रसारण में यह भी कहा गया कि इस बड़े नेता ने फोन पर यह कहा कि “जो हो रहा है उसको होने दो।” प्रसारण में यह दर्शाया गया कि यह बड़े नेता उत्तर प्रदेश शासन के वरिष्ठ माननीय मंत्री मोहम्मद आजम खां थे। प्रसारण में यह दर्शाया गया कि स्टिंग ऑपरेशन से यह परिलक्षित होता है कि दिनांक 08 सितम्बर, 2013 को उत्तर प्रदेश में कोई सरकार नहीं थी तथा कानून का कोई राज भी नहीं था।

“आज तक” चैनल पर प्रसारित “ऑपरेशन ‘दंगा’ पार्ट-2” में यह भी दर्शाया गया कि पुलिस की उपस्थिति में हिंसा हुई एवं दंगाइयों को पुलिस राजनैतिक दबाव के कारण नहीं छू सकी। “आज तक” चैनल में बार-बार यह जोर दिया गया कि “जो हो रहा था, उसे होने दिया जाये” के निर्देशों के कारण पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई तथा किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया, जिससे कि दंगे ने वीभत्स स्वरूप ले लिया एवं निर्दोषों को मारा गया।

इसी प्रकार टी.वी टुडे नेटवर्क के अंग्रेजी समाचार चैनल “हेड लाइन्स टुडे” में भी इस स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर “Operation Riot for Vote” कार्यक्रम प्रसारित किया गया। इस चैनल के प्रसारण में उत्तर प्रदेश शासन के वरिष्ठ मंत्री मोहम्मद आजम खां को विशिष्ट रूप से आरोपित करते हुए यह कहा गया कि उन्होंने सीधे उप-थानाध्यक्ष के स्तर पर फोन करके मुख्य आरोपियों को रिहा करवाया तथा यह निर्देश दिये कि एक सम्प्रदाय विशेष के लोगों को गिरफ्तार न किया जाय। इस प्रसारण में यह भी बल दिया गया कि मुजफ्फरनगर दंगों से संबंधित प्रथम सूचना रिपोर्ट को जानबूझकर असत्य रूप से दर्ज कराया गया। प्रसारण के अन्तर्गत इसे एक राजनीतिक षड्यन्त्र बताया गया तथा यह कहा गया कि कनिष्ठतम स्तर के पुलिस अधिकारी को वरिष्ठतम राजनैतिक व्यक्ति द्वारा इस प्रकार का फोन किया जाना सर्वथा अऩुचित एवं आपत्तिजनक एवं शर्म की बात है। “हेड लाइन्स टुडे” चैनल द्वारा प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर सच को उजागर करने का दावा किया गया।

मीडिया में प्रसारण के बाद की राजनीति

उत्तर प्रदेश विधानसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली, 1958 के नियम-56 के अन्तर्गत दिनांक 18 सितम्बर, 2013 के उपवेशन में जनपद मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के संबंध में माननीय नेता विरोधी दल एवं अन्य दलों की ओर से सूचना प्रस्तुत की गई जिस पर चर्चा हुई। चर्चा के दौरान उक्त मुजफ्फरनगर दंगों के विषय में कतिपय इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर प्रसारित किये गये स्टिंग ऑपरेशन की सत्यता के विषय में जांच कराये जाने हेतु संसदीय समिति गठित करने पर भी चर्चा की गई। नेता विरोधी दल द्वारा सदन में यह वक्तव्य दिया गया-

“मुजफ्फरनगर की घटना से सम्बन्धित और उसमें एक माननीय मंत्री को इंगित करने का काम, इसकी भी जांच होनी चाहिए। जिस मीडिया ने इस बात को दर्शाया है, तमाम अधिकारियों की बातों को लेकर के और उसे जीवंत दिखाने का काम किया है, तो उसका भी परीक्षण आपके स्तर से होना चाहिए। अगर कहीं पर मंत्री को, उन्होंने इंगित किया है। अगर मंत्री जी को कटघरे में खड़ा किया है और यह गलत है तो मीडिया को यहां पर कोड किया जाय और उसको यहां पर मान्यवर, आप की तरफ से इस बार इस तरह की व्यवस्था की जाय। आपके परीक्षण में यदि मीडिया की बात सही है, तो मंत्री जी, जिसको इंगित किया गया है उनको पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। ”

न्यूज रूम की संस्कृति

दीपक शर्मा

समिति के समक्ष आए साक्ष्य एवं टी.वी. टुडे नेटवर्क के विभिन्न पदाधिकारियों द्वारा किये गये अभिकथन से स्पष्ट होता है कि इस पूरे स्टिंग ऑपरेशन में दीपक शर्मा, एडिटर, स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम, टी.वी. टुडे नेटवर्क की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण थी। दीपक शर्मा ने समिति को बताया कि वह स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम के हेड थे तथा हेड होने के नाते उनका पूर्ण उत्तरदायित्व था। उन्होंने यह भी बताया कि स्टिंग ऑपरेशन में कैमरामैन नहीं होते हैं, वरन् इंवेस्टीगेटर रिपोर्टर ही होते हैं। यह स्टिंग ऑपरेशन स्पाई कैमरा से शूट किया गया था।

उनके अनुसार जब किसी विषय पर स्टिंग ऑपरेशन किए जाने के सम्बन्ध में रिपोर्टर सुझाव देते हैं अथवा किसी विषय पर यदि स्टिंग ऑपरेशन किए जाने के सम्बन्ध में निर्णय लिया जाता है तो उस हेतु सम्बन्धित पदाधिकारियों से सहमति ली जाती है। उससे स्पष्ट होता है कि किसी स्टिंग ऑपरेशन को करने से पहले सम्बन्धित चैनल के हेड, उसके मैनेजिंग एडिटर तथा प्रस्तुत प्रकरण में स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम के एडिटर द्वारा निर्णय लिया जाता है। इसके साथ ही चैनल के इनपुट हेड एवं आउटपुट हेड की भी स्टिंग ऑपरेशन सम्पादित करने तथा उसको प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

“आज तक” तथा “हेडलाइन्स टुडे” चैनल पर मुख्य रूप से इस प्रकार का प्रसारण किया गया कि मुजफ्फरनगर दंगों में जो मुख्य अभियुक्त गिरफ्तार किये गये थे उनको राजनैतिक दबाव, विशेष रूप से मोहम्मद आजम खां के निर्देश पर रिहा कर दिया गया। इन चैनलों पर स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर यह भी प्रसारित किया गया कि मो. आजम खां के स्तर से सीधे थानाध्यक्ष को फोन करके यह कहा गया कि जो हो रहा है उसको होने दिया जाए एवं यह कि एक विशेष सम्प्रदाय के व्यक्तियों को गिरफ्तार न किया जाए।

स्टिंग ऑपरेशन की जो सी.डी. प्रसारित की गयी है उससे यह स्पष्ट होता है कि किसी भी अधिकारी ने स्वयं मो. आजम खां का नाम नहीं लिया था। प्रकरण की इन परिस्थितियों एवं तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में दीपक शर्मा से जब यह पूछा गया कि फुगाना के सेकेण्ड ऑफिसर से स्टिंग ऑपरेशन के दौरान रिपोर्टर द्वारा यह कहा गया कि उनके ख्याल से मो. आजम खां के दबाव में अभियुक्तों को छोड़ा गया होगा, क्या इस प्रकार का सुझाव दिया जाना उपयुक्त एवं विधिक है तो दीपक शर्मा की ओर से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया जा सका। उन्होंने मात्र यह कहा कि यह प्रश्न हरीश शर्मा द्वारा पूछा गया था। उन्होंने यह भी कहा कि इस पूरे स्टिंग ऑपरेशन के दौरान उन्होंने स्वयं मो. आजम खां का नाम नहीं लिया। यह पूछने पर कि क्या ऐसा करना उचित है एवं क्या उनको हरीश शर्मा को ऐसा प्रश्न करने से नहीं रोकना चाहिए था तो उन्होंने उत्तर दिया कि चूंकि मो. आजम खां के नाम की चर्चा हो रही थी अतः ऐसा प्रश्न पूछा गया। दीपक शर्मा इस बात का भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए कि यदि मो. आजम खां के विषय में अन्यत्र ऐसी चर्चा की जा रही थी कि उन्होंने अभियुक्तों को रिहा कराया था तो उसके विषय में किसी समर्थित साक्ष्य का प्रसारण क्यों नहीं किया गया? दीपक शर्मा इस सम्बन्ध में भी कोई उत्तर नहीं दे पाए कि यदि मो. आजम खां के विषय में प्रसारण किया जाना था तो उनका पक्ष क्यों नहीं लिया गया? दीपक शर्मा द्वारा अन्यत्र पूछे जाने पर यह कहा गया कि  वह रिपोर्टर के सवाल से सहमत थे। उन्होंने इस बात से इंकार किया कि स्टिंग ऑपरेशन पूर्व निर्धारित उद्देश्यों से किया गया था। दीपक शर्मा  द्वारा अपने साक्ष्य में यह स्वीकार किया गया है कि मो. आजम खां का वर्जन न लेने से लापरवाही हुई है।

मुजफ्फरनगर दंगों के विषय में प्रथम सूचना रिपोर्ट को स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारण में दूषित (फर्जी) बताया गया। जब श्री दीपक शर्मा से इस विषय में पूछा गया तो उनकी और से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया कि किस आधार पर प्रथम सूचना रिपोर्ट को राजनैतिक दबाव में संशोधित करने की बात की गयी। स्टिंग ऑपरेशन में यह दर्शाया गया है कि कतिपय अभियुक्तों को राजनैतिक दबाव में रिहा कर दिया गया। दीपक शर्मा ने बताया कि इसमें राजनैतिक शब्द का प्रयोग गलत किया गया है। दीपक शर्मा अपने साक्ष्य में यह भी प्रमाणित नहीं कर पाये कि किसी वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा फोन किये जाने के संबंध में उनके पास कोई ठोस एवं प्रामाणिक साक्ष्य है या नहीं। उन्होंने स्वीकार किया कि इस संबंध में अन्य कोई साक्ष्य नहीं है। दीपक शर्मा से जब यह पूछा गया कि उनके रिपोर्टर ने मात्र मो. आजम खां का नाम क्यों लिया तथा किसी अन्य सम्प्रदाय या अन्य राजनैतिक व्यक्ति का नाम क्यों नहीं लिया तो वह इस संबंध में कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए।

दीपक शर्मा ने स्वीकार किया है कि प्रारम्भ में जो सी.डी. जांच समिति को रॉ फुटेज के रूप में उपलब्ध कराई गई थी वह रॉ फुटेज नहीं था तथा उसके पश्चात जांच समिति के निर्देशों पर जब पुनः इस आशय का निर्देश दिया गया तब रॉ फुटेज की दूसरी सी.डी. (सामग्री) टी.वी. टुडे नेटवर्क द्वारा उपलब्ध कराई गई थी। दीपक शर्मा द्वारा इस संबंध में टी.वी. टुडे नेटवर्क की ओर से की गयी त्रुटि को स्वीकार किया गया।

रिपोर्टर हरीश शर्मा

स्टिंग ऑपरेशन के एक अन्य रिपोर्टर हरीश शर्मा ने बताया कि मुजफ्फरनगर के दंगों के स्टिंग ऑपरेशन की टीम में तीन रिपोर्टर थे, जिसमें कि दीपक शर्मा हेड थे एवं अन्य सदस्यों में अरूण सिंह थे। हरीश ने यह भी बताया स्टिंग ऑपरेशन उन्होंने और अरूण सिंह ने दो कैमरों से शूट किया था। शर्मा वर्तमान में “आज तक” चैनल में कार्यरत नहीं हैं तथा वह “इंडिया टी.वी.” में कार्य कर रहे हैं। शर्मा ने यह स्वीकार किया है कि मोहम्म्द आजम खां के विषय में उन्होंने प्रश्न पूछा था, परन्तु इसके साथ उन्होंने यह भी बल देकर कहा कि इस प्रश्न को पूछने में टीम के तीनों सदस्यों की सहमति थी तथा इसके बारे में पूर्व में विचार किया गया था। अतः शर्मा के साक्ष्य से स्पष्ट है कि यद्यपि प्रश्न उन्होंने पूछा था, परन्तु इसमें दीपक शर्मा की सहमति भी थी। हरीश शर्मा ने यह कहा है कि उन्होंने मोहम्मद आजम खां का नाम इस कारण पूछा था क्योंकि ऐसी चर्चा थी। इसके अतिरिक्त शर्मा अन्य कोई प्रमाण अथवा आधार नहीं दे सके कि उन्होंने ऐसा प्रश्न क्यों पूछा। शर्मा यह भी स्पष्ट नहीं कर पाये कि मोहम्मद आजम खां की चर्चा कहां थी तथा किस अधिकारी अथवा व्यक्ति द्वारा उनका नाम इस सन्दर्भ में लिया गया था।

हरीश शर्मा ने यह भी बताया कि स्टिंग ऑपरेशन में वह विभिन्न तथ्यों को एकत्र करते हैं, परन्तु उनको प्रसारित करने का दायित्व उनका नहीं है और न ही इसके प्रसारण में उनकी कोई भूमिका है। हरीश शर्मा द्वारा अपने मौखिक साक्ष्य में यह स्वीकार किया गया है कि उन्होंने दीपक शर्मा से कहा था कि मुजफ्फरनगर दंगों में राजनैतिक दबाव अथवा किसी विशिष्ट राजनैतिक दल के विषय में प्रसारण नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि इस विषय में गहराई से छानबीन न कर ली जाये। शर्मा द्वारा यह भी अभिकथित किया गया कि उन्होंने दीपक शर्मा को यह भी बताया था कि मोहम्मद आजम खां के विषय में अन्य साक्ष्य भी एकत्र करने चाहिए क्योंकि स्टिंग ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य प्रशासनिक शिथिलता थी न कि किसी राजनैतिक व्यक्ति के विषय में।

रिपोर्टर अरुण सिंह

स्टिंग ऑपरेशन के तीसरे रिपोर्टर अरुण सिंह द्वारा अपने मौखिक साक्ष्य में कहा है कि उन्होंने और हरीश जी ने स्टिंग ऑपरेशन को शूट किया था। अरुण सिंह द्वारा यह भी कहा गया कि प्रसारण का निर्णय एडिटोरियल का है तथा उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी। सिंह ने यह स्वीकार किया कि शूटेड मैटेरियल/रॉ फुटेज में से कौन से अंश निकाले गये हैं, यह वह नहीं बता सकते, परन्तु उन्होंने कहा कि उसमें से जरूर कुछ अंश निकाले जाते हैं।  सिंह द्वारा भी इस पर बल दिया गया है कि मोहम्मद आजम खां के विषय में प्रश्न पूछने के संबंध में तीनों लोगों की सहमति थी। सिंह द्वारा अपने साक्ष्य में कहा गया है कि मोहम्मद आजम खां के विषय में जो आरोप लगाया गया था, वह खुलकर सामने नहीं आया था, इसलिए उन्होंने यह सुझाव दिया था कि इसको हटा दिया जाये।

आज तक चैनल के प्रबन्ध सम्पादक/चैनल हेड

टी.वी. टुडे नेटवर्क के “आज तक” चैनल के प्रबन्ध सम्पादक/चैनल हेड सुप्रिय प्रसाद ने स्वीकार किया कि स्टिंग ऑपरेशन करने की अनुमति वह देते हैं। उन्होंने इस स्टिंग ऑपरेशन की स्क्रिप्ट देखी थी। उनके अनुसार स्टिंग ऑपरेशन को तथ्यों के आधार पर रखा गया था। उनसे पूछे जाने पर यह कहा गया कि उन्होंने मोहम्मद आजम खां का पक्ष प्राप्त करने की कोशिश की, परन्तु वह उसमें सफल नहीं हुए। वे इस संबंध में कोई प्रामाणिक आधार नहीं बता पाये कि इस प्रकार का प्रसारण क्यों किया गया कि अभियुक्तों को राजनैतिक दबाव के कारण रिहा किया गया था। उन्होंने यह स्वीकार किया कि रिपोर्टर को उस प्रकार से मोहम्मद आजम खां के विषय में प्रश्न नहीं पूछना चाहिए था, जिस तरह से पूछा गया था। “मेरे ख्याल से आजम खां का फोन आया” नहीं पूछना चाहिए था तथा यह कि इसमें “मेरे ख्याल” से शब्द नहीं होना चाहिए था। सुप्रिय प्रसाद ने कहा कि जिस तरह से पुलिस वाले बोल रहे थे, उससे लगा कि ऊपर से फोन आया था, परन्तु वे इस तथ्य का कोई ठोस एवं प्रामाणिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके। उल्लेखनीय है कि सुप्रिय प्रसाद “आज तक” चैनल के प्रबन्धक सम्पादक के स्तर से ही स्टिंग ऑपरेशन सम्पादित करने की अनुमति दी गई थी एवं प्रसारण से पूर्व यह अपेक्षित था कि उनके स्तर से ही प्रसारण को भली-भांति देख लिया जाता। उन्होंने यह स्वीकार किया है कि सदन के एक वरिष्ठ सदस्य एवं मंत्री माननीय श्री मोहम्मद आजम खां के विषय में प्रसारण किये जाने से पूर्व और पुख्ता साक्ष्य होते तो अच्छा होता।

आउटपुट हेड मनीष कुमार

“आज तक” चैनल के आउटपुट हेड मनीष कुमार ने स्वीकार किया कि प्रसारण के लिए जो विषय तय किये जाते हैं वह आउटपुट हेड के माध्यम से ही निर्गत होते हैं। “आज तक” चैनल के स्टिंग ऑपरेशन की प्रक्रिया में एस.आई.टी. टीम के सीनियर एडिटर हेड होते हैं तथा स्टिंग ऑपरेशन से संबंधित सभी निर्णय एस.आई.टी. हेड द्वारा ही लिये जाते हैं तथा इसकी जवाबदेही भी एस.आई.टी. हेड की होती है। उन्होंने इस पर बल दिया कि यह भी एस.आई.टी. हेड द्वारा तय किया जाता है कि स्टिंग ऑपरेशन में क्या प्रसारित किया जाय एवं क्या न प्रसारित किया जाय। उन्होंने इस स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारण से पूर्व नहीं देखा था, क्योंकि यह एस.आई.टी. हेड से फाइनल होकर आया था।

उन्होंने यह स्वीकार किया कि मोहम्मद आजम खां के विषय में जो प्रश्न रिपोर्टर द्वारा पूछा गया था, वह बेहतर तरीके से पूछा जा सकता था। उन्होंने प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन के पैकेज को देखा था, परन्तु चूंकि इस संबंध में उच्च स्तर से निर्णय हो चुका था, अतः उसको प्रसारित किया जाना उनकी बाध्यता थी। उन्होंने यह भी बताया कि “लखनऊ से फोन आया था” यह पैकेज में नहीं था तथा यदि एंकर ने ऐसा कहा है तो एंकर पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता। स्टिंग ऑपरेशन की विषयवस्तु एस.आई.टी. एडिटर ही तय करते हैं।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मोहम्मद आजम खां के नाम का जो सुझाव स्टिंग ऑपरेशन में आया है वह नैतिक रूप से गलत है। किसी भी व्यक्ति ने स्टिंग ऑपरेशन के दौरान यह नहीं कहा है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट से राजनैतिक दबाव के कारण नाम हटाये गये हैं, तो फिर ऐसा प्रसारण करना गलत है। उनके अनुसार प्रसारण का अंतिम निर्णय प्रबन्ध संपादक का होता है। उन्होंने उस समय यह कहा था कि मोहम्मद आजम खां का पक्ष भी लिया जाना चाहिए, परन्तु उन्हें बताया गया था कि वह उपलब्ध नहीं हो रहे हैं।

मैनेजिंग एडिटर (इनपुट हेड)

रिफत जावेद, तत्कालीन मैनेजिंग एडिटर (इनपुट हेड), टी.वी. टुडे नेटवर्क ने कहा कि उन्होंने टी.वी. टुडे नेटवर्क में 16 सितम्बर को कार्यभार ग्रहण किया था, अतः प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन के अनुमोदन आदि में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। 17 सितम्बर को प्रातः दीपक शर्मा द्वारा उनको बताया गया कि आज कुछ धमाका होने वाला है। दीपक शर्मा द्वारा यह भी बताया गया कि वह एक “ऑपरेशन दंगा” कर रहे हैं, जिसमें कि प्रशासनिक शिथिलताओं पर फोकस कर रहे हैं। चूंकि वह बी.बी.सी. से उस समय आये थे, अतः स्टिंग ऑपरेशन में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस प्रकार के स्टिंग ऑपरेशन प्रसारित करने से पूर्व बहुत सावधानी बरती जानी चाहिए। इस प्रकार की खबर तभी प्रसारित की जानी चाहिए थी जब वह पूर्ण रूप से देख ली जाय तथा यदि इस संबंध में दूसरे पक्ष की प्रतिक्रिया नहीं मिलती है अथवा पुख्ता साक्ष्य नहीं मिलते हैं तो ऐसे स्टिंग ऑपरेशन को नहीं दिखाया जाना चाहिए। स्टिंग ऑपरेशन में यद्यपि प्रशासनिक शिथिलताओं की बात कही गई थी, परन्तु ऐसा नहीं किया गया। जब उन्होंने उस रात स्टिंग ऑपरेशन पर यह देखा कि उसमें मोहम्मद आजम खां का संदर्भ आया है तो वह स्तब्ध (शॉक्ड) रह गये। बी.बी.सी. में ऐसा हरगिज नहीं किया जाता। इस तरह के विषयों के लिए बी.बी.सी. में अपने मार्गदर्शी सिद्धान्त हैं तथा जब तक उनका अनुपालन नहीं किया जाता तब तक उनको प्रसारित नहीं किया जाता है। चूंकि प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन को बैलेंस नहीं किया गया, अतः उसे ड्रॉप कर दिया जाना चाहिए था। यदि उनका निर्णय होता तो वह यही करते।

जब उनकी बात हुई थी, तब प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन की एडिटिंग हो चुकी थी, परन्तु यदि गलती से ऐसा कोई तथ्य आ गया था, तो उसको हटाया जाना चाहिए था, क्योंकि यह एडिटोरियल नार्म्स के खिलाफ था। मैनेजिंग एडिटर को यह सोचना चाहिए था, क्योंकि इसकी वजह से दंगा और भड़क सकता था तथा ज्यादा लोग मारे जा सकते थे। उनका यह अनुभव रहा है कि टी.वी. टुडे ग्रुप में यह सावधानी नहीं बरती जाती। “आज तक” चैनल पर जो कुछ भी चलता है, उसका पब्लिक में इम्पैक्ट होता है। उन्होंने इस आशय का एक ट्वीट भी किया था कि इस प्रकार के प्रसारण से दंगा भड़क सकता था तथा उत्तर प्रदेश की राजनीति में ध्रुवीकरण का जो खेल खेला जा रहा था, इस प्रसारण के बाद उसको और बल मिलेगा। ऐसा नहीं होना चाहिए था तथा स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित करने से पहले उनकी अनुमति नहीं ली गई थी। यदि उनसे अनुमति ली जाती तो वह इसकी अनुमति नहीं देते। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि एस.आई.टी. एडिटर, मैनेजिंग एडिटर, “आज तक”, मैनेजिंग एडिटर, हेड लाइन्स टुडे द्वारा अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक ढंग से नहीं किया गया।

उन्होंने कहा कि मैनजिंग एडिटर द्वारा इसको देख लिया गया था। अतः उनके पास शक करने का कोई कारण नहीं था। यदि उन्हें इसके बारे में निर्णय लेने के लिए कहा जाता तो वह इसको पॉलिटिकल एंगिल से नहीं देखते, क्योंकि वह इस बात को समझते हैं कि पॉलिटिकल एंगिल से स्थितियां कितनी खतरनाक हो सकती हैं।
उन्होंने बताया कि यू.के. में “वाच डॉग” होता है, जो चैनल में प्रसारित होने वाले इस तरह के तमाम विषयों को रेगुलेट करता है तथा यदि कोई चैनल गैर जिम्मेदाराना तरीके से इस तरह की कोई खबर प्रसारित करता है, तो वह ऐसे चैनल पर कार्रवाई कर सकता है। हमारे यहां दिक्कत यह हो रही है कि हमारे यहां चैनल बहुत शक्तिशाली हैं, लेकिन उनको रेगुलेट करने वाला कोई नहीं है। यह स्थिति बहुत खतरनाक है। वे इस समूह में उसी समय आये थे तथा “आज तक” के मैनेजिंग एडिटर (आउटपुट) सुप्रिय प्रसाद तथा “हेड लाइन्स” के राहुल कंवल थे।

वाइस प्रेसीडेंस ऑपरेशन

रेहान किदवई, वाइस प्रेसीडेंस ऑपरेशन, टी.वी. टुडे नेटवर्क ने स्पष्ट किया कि स्टिंग ऑपरेशन की शूटिंग नार्मल कैमरे से अलग होती है। स्टिंग ऑपरेशन में शूटिंग कई बार होती है तथा उनको जोड़कर इकट्ठा किया जाता है। जोड़ने पर कट प्वाइंट होना स्वाभाविक है। राहुल कंवल को “हेड लाइन्स टुडे” के चैनल हेड के रूप में प्रतिपरीक्षित करने के दौरान उन्होंने यह बताया कि चैनल पर क्या खबर चलानी है, किस रूप में चलानी है एवं कितने बजे चलानी है, यह सब कार्य उनके कार्य एवं दायित्वों में निहित होता है।

आज तक के एंकर्स

‘टी.वी. टुडे नेटवर्क’ के उपर्युक्त पदाधिकारियों के अतिरिक्त एंकरों का मौखिक साक्ष्य लिया गया जिन्होंने इस स्टिंग ऑपरेशन को ‘टी.वी. टुडे नेटवर्क’ के “आज तक” तथा “हेड लाइन्स टुडे” चैनलों पर प्रसारित किया था। पुण्य प्रसून वाजपेयी जिनके द्वारा स्टिंग ऑपरेशन “आज तक” चैनल पर प्रसारित किया गया था, उन्होंने कहा कि स्टिंग ऑपरेशन के विषय में एडिटोरियल बोर्ड निर्णय लेते हैं। न्यूज रीडर के सामने जो लिखा होता है वह उसको पढ़ता है लेकिन एंकर के सामने कुछ भी लिखा नहीं होता है। वाजपेयी का यह साक्ष्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इससे यह परिलक्षित होता है कि एंकर अपने विवेक से भी बहुत सी बातें प्रसारण के समय कहता है। उन्होंने यह भी कहा है कि जो तथ्य उनके सामने आते हैं उनके आधार पर इन्टरप्रिटेशन (व्याख्या) एंकर के रूप में करते हैं। मोहम्मद आजम खां के विषय में जो प्रश्न पूछा गया है उसके विषय में समिति का क्रिटिकल होना जायज है तथा यदि वह स्वयं रिपोर्टर की जगह होते तो उनका तरीका भिन्न होता। इस प्रकार से उन्होंने यह स्वीकार किया कि रिपोर्टर ने जिस प्रकार से प्रश्न पूछा था वह उपयुक्त नहीं था। उन्होंने कहा कि “अब क्या होना चाहिए कैसे कह दें लेकिन जो चीज हुई हैं उनके साथ खड़े हैं। जो चीज हो रही हैं एडिटोरियली हम रिपोर्ट नहीं कर सकते जो आपको नागवार लगा है हम भी उसको बिना अधिकारियों के बोले नहीं कह रहे हैं। आपका ऐनेलिसिस बिल्कुल सही है, हम उससे इंकार नहीं कर रहे हैं।” इस प्रकार वाजपेयी ने परोक्ष रूप से यह स्वीकार किया कि समिति द्वारा जो शंकाएं प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारण के विषय में उठायी गयी हैं वह आधारविहीन नहीं हैं।  वाजपेयी द्वारा अपने साक्ष्य में स्वीकार किया गया कि एडिटोरियली जो रिपोर्ट चल रही थी उसका प्रसारण जो भी एंकर के जेहन में आया एंकर ने उसको सामने रखा। इससे स्पष्ट है कि वाजपेयी यह मानते हैं कि एंकर स्वविवेक से भी प्रसारण के समय विभिन्न तथ्यों को प्रदर्शित करते हैं।

राहुल कंवल

राहुल कंवल ने स्पष्ट किया कि स्क्रिप्ट तैयार करने, उसकी एडिटिंग करने एवं उसको अंतिम स्वरूप देने में चैनल हेड की भूमिका होती है। कंवल ने यह भी स्वीकार किया कि आजम खां को इस विषय में आरोपित करने से पूर्व उनका पक्ष लिया जाना चाहिए था, परन्तु चूंकि वह उपलब्ध नहीं हो सके, अतः उनका पक्ष नहीं लिया गया। यह पूछे जाने पर कि स्टिंग ऑपरेशन के दौरान रिपोर्टर्स ने यह कहा था कि “मेरे ख्याल से इसमें आजम खां का दबाव है”, उपयुक्त है या नहीं। तो राहुल कंवल द्वारा कहा गया है कि “ख्याल के आधार पर ही” एन्वेस्टीगेशन होता है एवं पत्रकार पूछता है।

राहुल कंवल मैनेजिंग एडिटर, हेड लाइन्स टुडे जिन्होंने कि हेडलाइन्स टुडे पर प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन को एंकर के रूप में प्रसारित किया था, द्वारा अपने मौखिक साक्ष्य में कहा कि स्टिंग ऑपरेशन में रिपोर्टर, एस.आई.टी. टीम के लोग, इनपुट के लोग एवं आउटपुट के लोग शामिल होते हैं। कंवल द्वारा कहा गया कि उनका सम्बन्ध इस कार्यक्रम में केवल अंग्रेजी में जो प्रोग्राम दिखाया था उससे है वह उसी से सम्बन्धित प्रश्नों का जवाब दे पाएंगे। राहुल कंवल ने अपने मौखिक साक्ष्य में मुख्य रूप से कहा कि स्टिंग ऑपरेशन के दौरान जो तथ्य उभरकर आये हैं उनकी कड़ियां जोड़कर उन्होंने उसको प्रस्तुत किया। राहुल कंवल अपने साक्ष्य में यह नहीं बता पाये कि विभिन्न बातें जो उन्होंने प्रसारण के दौरान एंकर के रूप में कही हैं उनके पुख्ता साक्ष्य क्या हैं? राहुल कंवल से पूछे जाने पर कि उन्होंने राजनैतिक दबाव की बात कैसे कही तो उत्तर दिया कि स्टिंग ऑपरेशन के विभिन्न तथ्यों से उन्होंने यह ‘कॉनक्लूजन’ निकाला कि पुलिस को शिथिलता बरतने के लिए राजनैतिक दबाव था। प्रथम सूचना रिपोर्ट को गलत तरीके से दर्ज कराये जाने के लिए ऊपर से दबाव था इस बात के विषय में भी उन्होंने कहा कि यह ‘कॉनक्लूजन’ उन्होंने स्टिंग ऑपरेशन में उजागर हुए विभिन्न प्रश्नों के उत्तर से निकाला था। राहुल कंवल से जब यह पूछा गया कि यह उनका ‘इनफ्रेन्स’ है तो उन्होंने बल देकर कहा कि यह उनका ‘इनफ्रेन्स’ नहीं वरन् ‘कॉनक्लूजन’ है।

कंवल द्वारा अत्यंत बल देकर यह बात कही गयी कि उन्होंने विभिन्न कड़ियां जोड़कर यह ‘कॉनक्लूजन’ निकाले हैं, परन्तु उनके द्वारा ऐसा कोई ‘कॉनक्लूसिव’ साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जो स्टिंग ऑपरेशन में ऐसी बातें कहने हेतु उजागर हुए हों। कंवल द्वारा स्वीकार किया गया कि आजम खां के विषय में रिपोर्टर द्वारा जो प्रश्न पूछे गये उसका अन्दाज सही नहीं था। यदि वह स्वयं इस प्रश्न को पूछते तो वह अलग अन्दाज में पूछते। कंवल के अनुसार इसमें केवल अन्दाज का फर्क है। राहुल कंवल द्वारा कहा गया कि जो पुलिस प्रशासन कह रहा था उसकी कड़ियां जोड़कर जो तस्वीर बनती है उसके आधार पर उन्होंने कहा कि ऊपर से दबाव के कारण अभियुक्तों को रिहा किया गया। राहुल ने अपने मौखिक साक्ष्य में कहा कि सभी अधिकारियों के जो अभिकथन स्टिंग ऑपरेशन के दौरान आये हैं उनको जोड़कर देखने से यह तस्वीर बनती है कि उस समय ऊपर से दबाव था।

कंवल से जब पूछा गया कि उन्होंने स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारण के दौरान यह बात कैसे कही कि आजम खां द्वारा दरोगा को फोन किया गया था तो उन्होंने कहा कि चूंकि जिस दरोगा से प्रश्न पूछा गया था उसका उत्तर ‘बिल्कुल ठीक है, बिल्कुल ठीक है’ था। अतः उन्होंने इस संदर्भ में प्रस्तुतिकरण किया। राहुल कंवल द्वारा कहा गया कि हो सकता है कि मोहम्मद आजम खां का फोन आया हो तथा उनके पास जो स्क्रिप्ट एवं आधार हैं उसी के आधार पर स्टोरी खड़ी की गयी। इस प्रकार कंवल द्वारा अपने साक्ष्य में स्वीकारा गया कि राजनैतिक दबाव अथवा आजम खां द्वारा निर्देश दिये जाने के विषय में उनके पास कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं थे वरन् उन्हें स्टिंग ऑपरेशन में दिये गये विभिन्न तथ्यों के आधार पर अपना स्वयं का ‘कॉनक्लूजन’ निकाला था। कंवल द्वारा स्पष्ट किया गया कि इस स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारण बहुत सोच-समझ कर किया गया है तथा इसमें सभी सावधानियां बरती गयी हैं।

कंवल से जब यह पूछा गया कि उन्होंने यह बात किस आधार पर कही कि अभियुक्तों को आजम खां के कहने पर रिहा कर दिया तो उन्होंने कहा कि जब एक के बाद एक तथ्यों को जोड़ा तो उससे यह ‘कॉनक्लूजन’ निकल रहा है। इस पर राहुल कंवल के मौखिक साक्ष्य में यह स्पष्ट आया है कि उन्होंने विभिन्न तथ्यों के आधार पर अपना ‘कॉनक्लूजन’ निकाला एवं तदनुसार स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित कर दिया। राहुल कंवल द्वारा अपने मौखिक साक्ष्य में यह भी कहा गया कि स्टिंग ऑपरेशन के मामले में प्रभावित पक्ष का वर्जन प्रसारण के दौरान ही लिया जाता है क्योंकि यदि उससे पहले उनका वर्जन लिया जायेगा तो स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित किया जाना मुश्किल होगा।

एंकर गौरव सावंत

“हेड लाइन्स टुडे” के एंकर गौरव सावंत द्वारा मौखिक साक्ष्य में मुख्य रूप से कहा गया है कि उनकी भूमिका एंकर के रूप में स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारण की थी तथा जो भी बातें उन्होंने कहीं उसके बारे में उनके चैनल के सम्पादक द्वारा लिये गये निर्णय के अनुसार लिखा हुआ दिया जाता है जिसको कि वे पढ़ते हैं। गौरव सावंत से पूछे जाने पर स्वयं के विवेक का प्रयोग करने के विषय में संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाये। ‘कतिपय’ शब्द जो उनके द्वारा प्रसारण के दौरान साम्प्रदायिकता के विषय में बोले गये थे उसके बारे में गौरव सावंत ने कहा कि जो साक्ष्य स्टिंग ऑपरेशन के दौरान उजागर हुए थे उसके आधार पर उन्होंने वह प्रस्तुतिकरण किया था। गौरव सावंत द्वारा स्वीकार किया गया कि जो कुछ भी उन्होंने एंकर के रूप प्रस्तुतिकरण के सम्बन्ध में बोला है उसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार हैं जब गौरव सावंत से पूछा गया कि इस बारे में उन्हें कोई साक्ष्य दिया गया कि लखनऊ से किसी ऊंचे स्तर से फोन आया तो उन्होंने कहा कि मुझे इस बारे में कोई साक्ष्य नहीं दिये गये थे।

सावंत द्वारा अपने साक्ष्य में यह भी स्वीकार किया गया कि खबर रोकी नहीं जानी चाहिए परन्तु हर चीज को वैरीफाई करके ही दिखाया जाना चाहिए। सावंत से समिति द्वारा जब यह पूछा गया कि उन्होंने सरकारी सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया तथा उत्तरप्रदेश विधानसभा के एक वरिष्ठ सदस्य का नाम लिया जबकि स्टिंग ऑपरेशन के दौरान किसी अधिकारी ने ऐसा नहीं कहा कि सरकार दंगाइयों से मिल गयी थी तो क्या दिखाने से पहले इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए था तो गौरव सावंत द्वारा स्वीकार किया गया कि उनके वरिष्ठों द्वारा इस पर विचार जरूर करना चाहिए था।

पद्मजा जोशी

‘हेड लाइंस टुडे’ की एक अन्य एंकर जिन्होंने प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित किया था पद्मजा जोशी द्वारा अपने मौखिक साक्ष्य में कहा कि स्टिंग ऑपरेशन का निर्णय एस.आई.टी. के एडिटर के स्तर पर होता है तथा उन्हें मात्र एंकरिंग करने के लिए कहा जाता है। एंकर की सहमति नहीं ली जाती उसे निर्देश दिये जाते हैं। जोशी द्वारा कहा गया कि उनको जो स्क्रिप्ट दी जाती है उसी के आधार पर वह प्रस्तुतिकरण करती हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या वह एंकर के रूप में अपने विवेक का प्रयोग नहीं करती तो जोशी द्वारा उत्तर दिया गया कि “जी नहीं, वह अपने वरिष्ठों पर विश्वास करती है”। जब जोशी से पूछा गया कि उनको नहीं लगता कि स्टिंग ऑपरेशन में कुछ ऐसी बाते हैं जो आधारविहीन हैं और जिसके कारण दंगा बढ़ सकता है तो इस बारे में उन्होंने स्वीकार किया कि भविष्य में इसको देखा जा सकता है। जोशी द्वारा अधिकतर प्रश्नों का यही उत्तर दिया गया कि उनको जो निर्देश अथवा स्क्रिप्ट मिलती है उसी के अनुसार वह कार्य करती हैं यहां तक कि वह स्वयं के विवेक का इस्तेमाल नहीं करती हैं।

मुख्य कार्यपालक अधिकारी

” टी.वी. टुडे ” नेटवर्क के मुख्य कार्यपालक अधिकारी आशीष बग्गा ने बताया कि उनकी इस मामले में कोई भूमिका नहीं थी। बग्गा के अनुसार स्टिंग ऑपरेशन में सभी निर्णय चैनल हेड/चैनल एडिटर लेते हैं तथा रिपोर्टर्स एवं करेसपोंडेंस कवरेज करके चैनल एडिटर को सामग्री देते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन किये जाने से पूर्व उनकी अनुमति नहीं ली गई थी। प्रसारण से पूर्व स्टिंग ऑपरेशन को देखने की बात को भी बग्गा ने नकारा है। बग्गा के अनुसार वह मुख्य रूप से ग्रुप के व्यापार का पर्यवेक्षण करते हैं। बग्गा ने साक्ष्य में इस बात की भी अनभिज्ञता प्रदर्शित की कि स्टिंग ऑपरेशन में कतिपय राजनैतिक व्यक्तियों के विरुद्ध आरोप लगाये गये हैं। बग्गा ने दीपक शर्मा के इस कथन को गलत बताया कि मुख्य कार्यपालक अधिकारी से प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन की अनुमति ली गई थी। बग्गा के अऩुसार इस प्रकार की अनुमति एवं क्लीयरेंस चैनल हेड द्वारा दी जाती है। बग्गा ने स्वीकार किया है कि यदि प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन मार्गदर्शी सिद्धान्तों के विरुद्ध है तो वह उपयुक्त नहीं है। बग्गा ने यह स्वीकारा है कि स्टिंग ऑपरेशन में टेक्नीकली जो गलत बातें कही गयी हैं वह गलत मानी जायेंगी, परन्तु उनका स्पष्टीकरण एडिटोरियल वाले ही दे सकते हैं। जब बग्गा से यह ज्ञात किया गया कि यदि स्टिंग ऑपरेशन में गाइडलाइन्स का अनुपालन नहीं किया गया है तो आपके स्तर से प्रस्तुत प्रकरण में क्या एक्शन लिया गया है, तो उन्होंने कहा कि संबंधित व्यक्ति अब कम्पनी में कार्यरत नहीं है।

अरुण पुरी, प्रबंध निदेशक

समिति द्वारा अरुण पुरी, प्रबंध निदेशक, “टी.वी टुडे नेटवर्क” को समिति के समक्ष साक्ष्य हेतु उपस्थित होने के निर्देश दिये गये थे। अरुण पुरी द्वारा समिति के समक्ष एक अनुरोध पत्र प्रेषित किया गया, जिसमें कि उन्होंने यह निवेदन किया कि वह अपने दायित्व कम्पनी की नीतियों के अनुसार निभाते हैं। कम्पनी के विभिन्न कामों को कार्यरूप में परिणत करने की जिम्मेदारी कम्पनी के उन अधिकारियों एवं कर्मचारियों को सौंपी गई है, जिन्हें इस काम के लिए विशेष रूप से कम्पनी ने नियुक्त किया है। पुरी के अनुसार वह समाचार प्रसारण समेत कम्पनी के अन्य दैनिक कामों में सीधे तौर पर सम्मिलित नहीं होते हैं। पुरी के अनुसार टी.वी.टी.एन. के इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया में भी कम्पनी ने विशेष जिम्मेदार लोगों को नियुक्त किया है, जिन्हें आधिकारिक तौर पर निर्णय लेने की शक्ति प्रदान की गई है।

अरुण पुरी द्वारा अपने पत्र में समिति को यह अवगत कराया कि स्टिंग ऑपरेशन के मामले में टी.वी.टी.एन. एक विस्तृत प्रक्रिया का पालन करता है। टी.वी.टी.एन. सबसे पहले यह सुनिश्चित करता है कि स्टिंग ऑपरेशन जनहित में होना चाहिए। स्टिंग ऑपरेशन की संस्तुति से पहले मैनेजिंग एडिटर के आदेश पर इनपुट एडिटर स्टिंग ऑपरेशन की व्यावहारिकता की समीक्षा करता है। एक बार अच्छी तरह से सबूतों की जांच-परख और विश्लेषण के बाद पत्रकारिता के मानदण्डों के अनुरूप संवाददाताओं को स्टिंग ऑपरेशन करने की इजाजत दी जाती है। पुरी ने यह भी अवगत कराया कि स्टिंग ऑपरेशन को सम्पादित करने के लिए टी.वी.टी.एन. ने स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम (एस.आई.टी.) का गठन किया है। एस.आई.टी. द्वारा स्टिंग ऑपरेशन सम्पादित करने के पश्चात् रॉ फुटेज को कॉपी किया जाता है और उसे उसी रूप में आउटपुट हेड के पास भेजा जाता है। पुरी के अनुसार अंतिम रूप से स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित करने की संस्तुति एस.आई.टी. एडिटर देता है। उन्होंने यह भी बताया कि एस.आई.टी. के एडिटर दीपक शर्मा को इस तरह के अधिकार दिये गये थे।

पुरी ने समिति को यह भी सूचित किया है कि प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन के संबंध में टी.वी.टी.एन. ने भी एक आन्तरिक जांच शुरू की थी। इससे पहले कि यह जांच पूरी होती, दीपक शर्मा (एस.आई.टी.) कम्पनी का साथ छोड़ गये तथा इस प्रकरण से संबंधित 02 अन्य रिपोर्टर्स भी कम्पनी से सेवामुक्त हो चुके हैं। पुरी ने यह भी कहा है कि उन्होंने सदैव यह प्रयास किया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इस प्रकार से प्रयोग किया जाये जिससे कि विधायिका या विधायिका के किसी सदस्य की अवमानना न हो।

साधना चैनल

साधना न्यूज चैनल पर “आजम खां स्टिंग आपरेशन का सच” नाम से एक कार्यक्रम किया गया था। समिति द्वारा उसको देखा गया तथा देखने के पश्चात साधना न्यूज चैनल के राजनैतिक संपादक माधुरी सिंह को साक्ष्य हेतु बुलाया गया। माधुरी सिंह ने समिति के समक्ष बताया कि वह लगभग 16 -17 सालों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम कर रही हैं। प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन के विषय में माधुरी सिंह द्वारा कहा गया कि इसमें रिपोर्टर की ओर से जबरन मोहम्मद आजम खां का नाम अपनी तरफ से बोलकर प्रस्तुत किया गया, जिसे कि संबंधित पुलिस अधिकारी द्वारा सही तरीके से इंडोर्स भी नहीं किया गया। माधुरी सिंह द्वारा कहा गया कि प्रश्नगत स्टिंग ऑपरेशन को स्टिंग ऑपरेशन की संज्ञा नहीं दी जा सकती, क्योंकि जिस पुलिस अधिकारी से आजम खां के विषय में पूछा गया था, उसने संतोषजनक एवं उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से उत्तर नहीं दिया था।

माधुरी सिंह के अनुसार चूंकि आजकल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनलों में टी.आर.पी. बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा है, अतः इस प्रकार के कार्यक्रम प्रसारित किये जाते हैं, जो कि अनुत्तरदायिपूर्ण हैं। “आज तक” चैनल पर सुबह से ही इतने बड़े दंगों का जो सच दिखाया जा रहा था उसमें पुलिस अधिकारी स्तर के एक व्यक्ति ने आजम खां का नाम लिया तथा कुछ अन्य बातें भी कहीं जिसका कोई आधार नहीं दर्शाया गया था। प्रश्न पूछने पर भगौर (पुलिस अधिकारी) द्वारा कोई स्पष्ट उत्तर भी नहीं दिया गया और न ही कोई इंट्रेस्ट दिखाया गया। बिना जांच- पड़ताल के इस प्रकार की खबरों को प्रकाशित करने से माधुरी सिंह के अनुसार सामाजिक सद्भाव बिगड़ता है जोकि उपयुक्त नहीं है।

मोहम्म्द आजम खां

समिति के समक्ष मोहम्म्द आजम खां का साक्ष्य भी लिया गया। मो. आजम खां द्वारा समिति के समक्ष अभिकथित किया गया कि उनकी मुज्जफरनगर दंगों के विषय में किसी से कोई बात नहीं हुई, न किसी नेता से ओर न ही किसी अधिकारी से। खां द्वारा स्पष्ट किया गया कि मंत्री रहकर उनके स्तर से इस प्रकार के फोन कभी नहीं किये जाते। उन्होंने कहा कि इस स्टिंग ऑपरेशन से उनकी छवि को अत्यंत आघात पहुंचा है। खां द्वारा अपने साक्ष्य में यह भी स्प्ष्ट किया गया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चरित्र को इस पूरे स्टिंग ऑपरेशन से कलंकित किया गया तथा इस पूरे ऑपरेशन का उद्देश्य मात्र शोहरत तथा टी.आर.पी. बढ़ाने का हो सकता है। खां द्वारा स्प्ष्ट किया गया कि उनसे टी.वी. टुडे नेटवर्क के किसी भी व्यक्ति ने उक्त स्टिंग ऑपरेशन प्रसारित करने से पूर्व कोई बात नहीं की।

खां के अनुसार टी.वी. टुडे के वह चैनल जिन्होंने स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित किया है वह दो सम्प्रदायों के बीच नफरत पैदा करने के लिये, दंगा अधिक भड़काने के लिये, उनकी छवि को सर्वथा नष्ट करने के लिये दोषी हैं। खां द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया कि इस स्टिंग ऑपरेशन के बाद बहुत बड़े पैमाने पर दंगे हो सकते थे जो कि किन्हीं कारणों से और सरकारी चुस्ती से नहीं हुए। खां द्वारा यह भी बताया गया कि इस स्टिंग ऑपरेशन के बाद मुजफ्फरनगर और दूसरे जनपदों में कानून व्यवस्था बिगड़ने के लिये भी यह चैनल जिम्मेदार है। स्टिंग ऑपरेशन से सदन की एवं उनकी स्वयं की अवमानना हुई है और लोकतंत्र तथा इंसानियत की भी अवमानना हुई है जो सर्वथा निंदनीय है।

 

 

 

पत्रकारिता का भविष्य: पत्रकारिता संस्थानों में एक सर्वेक्षण

देश में पत्रकारिता के अध्ययन और व्यावहारिक प्रशिक्षण की इस पृष्ठभूमि से जाहिर है कि असमान स्थितियों और कई तरह के अंतर्विरोधों के बीच पत्रकारिता का भविष्य तैयार हो रहा है। पत्रकारिता को व्यवसाय के लिए अध्ययन का क्षेत्र बनाने पर ज्यादा जोर दिखता है न कि लोकतंत्र के लिए भविष्य की पत्रकारिता को एक शक्ल देने की कोई ठोस योजना है। लोकतांत्रिक मूल्यों और विचारों के आलोक में नीतिगत स्तर पर पत्रकारिता की कोई ठोस शक्ल सूरत नहीं होने की स्थिति में यह जरूरी लगता है कि हमें भविष्य की पत्रकारिता का एक आकलन करना चाहिए। इसी उद्देश्य से निम्न अध्ययन का प्रारूप तैयार किया गया है। सर्वेक्षण के रूप में यह संक्षिप्त अध्ययन सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के छात्र-छात्राओं के बीच किया गया है।

इस सर्वेक्षण में दिल्ली विश्वविद्यालय अंतर्गत अदिति महाविद्यालय, रामलाल आनंद कॉलेज, भीमराव अम्बेडकर कॉलेज और गुरुनानक देव खालसा कॉलेज व जामिया मिलिया इस्लामिया के पी.जी डिप्लोमा तथा निजी क्षेत्र के शारदा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्र -छात्राओं को शामिल किया गया है। इस सर्वेक्षण में दिल्ली विश्वविद्यालय एवं उसके अंतर्गत कॉलेजों के 209 छात्र, केन्द्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया के 40 छात्र और शारदा विश्वविद्यालय के 54 छात्र-छात्राएं शामिल हुए।

पूरा सर्वेक्षण पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

पत्रकारिता संस्थानों में एक सर्वेक्षण