सेंसरशिप का नया नाम – नो निगेटिव न्यूज

जन मीडिया का फरवरी अंक
जन मीडिया का फरवरी अंक

जस्टिस जे.एस.वर्मा मेमोरियल लेक्चर में सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने उचित टिप्पणी की है कि भारतीय मीडिया पर प्रतिबंध (सेंसरशिप) लगने का दौर खत्म हो गया है।1 इसकी वजह को स्पष्ट करते हुए उन्होने कहा कि तकनीकी विकास और विस्तार इस हद तक हो गया है कि सेंसरशिप संभव नहीं है। लेकिन क्या सेंसरशिप सरकार की मीडिया के खिलाफ कानूनी तौर पर दमन और स्वतंत्र तरीके से काम करने में अड़चने पैदा करने की कार्रवाई का पर्याय है अथवा एक विचार है? विविध तकनीकी, उसकी व्यापक स्तर पर उपलब्धता और तकनीकी के विकास के उन्नतर स्तर पर पहुंचने के बावजूद सेंसरशिप संभव है?

तकनीकी विस्तार से मीडिया पर प्रतिबंध असंभव नहीं हुआ है, बल्कि मीडिया यह प्रतिबंध अन्य स्वरूप में काफी हद तक जगह पा चुका है।2 भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से में स्वघोषित प्रतिबंध (सेल्फ सेंसरशिप) की कोशिशें चल रही हैं। इसके तहत विविध तकनीक के माध्यम से सक्रिय मीडिया संस्थान ऐसी सूचनाओं के प्रकाशन , प्रसारण पर रोक लगा देते हैं, जो सत्ता या प्रभुत्वशाली समूह को अप्रिय लग सकती है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखे तो यहां मीडिया से हमेशा रचनात्मक भूमिका अदा करके की अपील सत्ता द्वारा की जाती है।( देखें इंदिरा गांधी के भाषण के लिए जनमीडिया ) सूचना प्रसारण मंत्री ने अपने वक्तत्व में मीडिया से रचनात्मक भूमिका निभाने की अपील की थी। मीडिया की रचनात्मक भूमिका का क्या मतलब है?

कई अर्थों में मीडिया की एक पक्षीय भूमिका अदा करने का अप्रत्क्षय दबाव की स्थिति बनी हुई हैं। तीसरी दुनिया के देशों में मीडिया की भूमिका को लेकर कई तरह की अवधारणाएं प्रस्तुत की गई है।रचनात्माक भूमिका या विकास के लिए पत्रकारिता का कोई भिन्न अर्थ नहीं है।तीसरी दुनिया के देशों में विकास की पत्रकारिता की अवधारणा पूंजीवादी देशों के आर्दशों के अनुरूप पूर्व में पेश की जा चुकी है। (देखें जन मीडिया ,दिलीप खान ) रचनात्मक भूमिका का राजनीतिक अर्थ वही है, जिसे विकास पत्रकारिता के रूप में स्थापित करने की कोशिश है।

सेंसरशिप के दो रूप दिखते हैं।एक तो सरकार द्वारा की जाने वाली कार्रवाई के रूप में दिखाया गया है। दूसरा मीडिया संस्थान अपने स्तर पर सेंसरशिप के मानदंड निर्धारित करे।

मीडिया से रचनात्मक या गैर नकारात्मक होने की अपील ने सेल्फ सेंसरशिप (स्व प्रतिबंध) को मजबूती दी है। दैनिक भास्कर देश में सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आने वाली भाषा हिन्दी के सबसे बड़े समाचार पत्रों में एक है। सूचना एवं प्रसारण मंत्री की रचनात्मक भूमिका की अपील के बाद की तिथि में उसने खबरों की दो श्रेणियां तैयार की है जिसे हिन्दी के समाचार पत्र ने अंग्रेजी के दो शब्दों ; निगेटिव एवं पॉजीटिव में नाम दिया है। ये खबरों ( सामग्री) की श्रेणियां नहीं है। बल्कि समाज में घटित तमाम तरह की गतिविधियों को लेकर एक नजरिया विकसित करने की कवायद का हिस्सा लगती है।

दैनिक भास्कर के इस प्रयोग के आधार पर अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि जनमाध्यमों में प्रकाशित होने वाली सूचनाओं व खबरों का गैर नकारात्मक या नकारात्मक विभाजन का कोई सैद्धांतिक आधार नहीं है। जस्टिस जे.एस. वर्मा मेमोरियल लेक्चर के एक दिन बाद दैनिक भास्कर ने 19 जनवरी, 2015 को पहले पेज पर विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसमें लिखा है-

ना हत्या, ना अपहरण ना लूट ना मारकाट। अब आप विश्व के पहले ऐसे पाठक होंगे जिनके सप्ताह की शुरुआत होगी नो निगेटिव सोमवार से ,अंत भला तो सब भला। यह तो हम सभी जानते हैं। परंतु देश का नंबर 1 अखबार दैनिक भास्कर एक नई कहावत को चरितार्थ करने जा रहा है कि शुरुआत भली हो तो अंत भी भला ही होगा। हमने अपने करोड़ों पाठकों के सप्ताह की शुरुआत नो निगेटिव सोमवार से करने की पहल की है। विश्व मीडिया में इस तरह का प्रयास करने वाले दैनिक भास्कर शायद पहला अखबार होगा, जिसके सोमवार के अंक में पहले पेज से लेकर अंतिम पेज तक निगेटिव खबरों को चयनित कर अलग कर दिया जाएगा। (मोटे अक्षरों में) हमें विश्वास है कि निगेटिव खबरों से फैली नकारात्मकता को दूर करने का हमारा यह नया प्रयास पाठकों को कामयाबी के पथ पर अग्रसर करने में सहयोगी होगा।

नो निगेटिव न्यूज, हर सोमवार

आज से नो निगेटिव न्यूज के साथ करें, सप्ताह की पॉजिटिव शुरुआत

19 तारीख यानि सोमवार को नो निगेटिव न्यूज के दावे के विपरीत अखबार ने कई खबरों को नकारात्मक वर्गीकरण के साथ यह कहते हुए प्रकाशित किया कि वही खबरें जो जरूरी हैं। इससे स्पष्ट होता है कि जनमाध्यम सूचनाओं के प्रवाह के लिए नई शर्तें तय कर रहा है, जिसका कोई स्थायी मानक संभव नहीं है। इसमें व्यक्ति का नजरिया या पूर्वाग्रह या हितों की अधिकाधिक भूमिका होगी। सत्ता या खबर का वर्गीकरण करने वाले सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक नजरिए से जो खबर नकारात्मक होगी, जरूरी नहीं पाठकों के लिए वह नकारात्मक ही हो। उदाहरण के लिए, ‘मोदी को फिर पीएम बनाना है तो हिन्दू पैदा करें 10 बच्चेः वासुदेवानंद’, केजरीवाल के बयान, मतदान के दौरान पथराव, बीएड की फर्जी डिग्री जैसी खबरों के वर्गीकरण में अखबार के विभिन्न संस्करणों में टकराव देखा गया। (देखें सारणी-1) वासुदेवानंद के बयान से जुड़ी खबर को भोपाल, बिलासपुर, बस्तर, कोरिया, फरीदाबाद संस्करण में नकारात्मक खबर, तो जयपुर, कोटा, रांची, जमशेदपुर संस्करण में गैर-नकारात्मक खबर के रूप में वर्गीकृत किया गया। इसी तरह दिल्ली चुनाव के सिलसिले में केजरीवाल के बयान को बस्तर व जमशेदपुर संस्करण में नकारात्मक वर्गीकरण, जबकि रायपुर, बिलासपुर, फरीदाबाद, हिसार, नई दिल्ली, रांची संस्करण में गैर-नकारात्मक खबर माना गया। यही नहीं, यह वर्गीकरण सुविधानुसार अपनाया गया। कारण कि ग्रामीण क्षेत्रों के संस्करणों या पुलआउट में ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं अपनाया गया। इससे वर्गीकरण की संदिग्धता व अतार्किकता सामने आती है।

निष्कर्षः नकारात्मक व गैर-नकारात्मक खबरों के वर्गीकरण की तार्किकता न केवल संदिग्ध है, बल्कि यह सेल्फ सेंसरशिप का नया औजार है। यह न केवल सूचनाओं का प्रवाह बाधित करता है, बल्कि जनमाध्यम सूचना प्रसारित करने की जगह निर्णयकर्ता के रूप में आने लगते हैं। यह समाज की एक छद्म तस्वीर पेश करने की प्रक्रिया भी है, जिसमें समाज का नुकसान कर रही प्रवृत्तियों के उजागर होने की संभावाएं घटती हैं। यह पूरी प्रक्रिया सत्ता पक्ष की जवाबदेही तय करने वाली दबाव-समूह की व्यवस्था को नष्ट करता है, जिसे लोकतांत्रिक विकास के लिए बेहतर नहीं कहा जा सकता है।

सारणी-1 दैनिक भास्कर के विभिन्न संस्करणों द्वारा द्वारा नो निगेटिव सोमवार को प्रकाशित कुछ खबरों का वर्गीकरण*

खबरों के शीर्षक जिन संस्करणों में इसे नकारात्मक खबर के रूप में वर्गीकृत किया गया है जिन संस्करणों में इसे गैर-नकारात्मक खबर के रूप में वर्गीकृत किया गया है
मोदी को फिर पीएम बनाना है तो हिंदू पैदा करें 10 बच्चेः वासुदेवानंद रायपुर (पेज-1)
बिलासपुर (पेज-1)
बस्तर (पेज-1)
कोरिया (पेज-1)
फरीदाबाद (पेज-1)
जयपुर (पेज-20)
कोटा (पेज-18)
रांची (पेज-16)
जमशेदपुर (पेज-16)
राजपक्षे की हार में रॉ की भूमिका जयपुर (पेज-20)
जोधपुर (पेज-15)
कोटा (पेज-17)
उदयपुर (पेज-15)
बिलासपुर (पेज-10)
कोरिया (पेज-10)
फरीदाबाद (पेज-13)
हिसार (पेज-14)
नईदिल्ली (पेज-12)
चाईबासा (पेज-15)
जमशेदपुर (पेज-14)
मुज्जफरपुरः युवक की हत्या के बाद 40 घर फूंके, 3 जिंदा जले जयपुर (पेज-21)
जोधपुर (पेज-21)
कोटा (पेज-21)
उदयपुर (पेज-21)
रायपुर (पेज-21)
बिलासपुर (पेज-21)
नई दिल्ली (पेज-21)
रांची (पेज-21)
भाजपा कांग्रेस से पैसे लो, वोट आप को देनाः केजरीवाल बस्तर
जमशेदपुर
रायपुर
बिलासपुर
फरीदाबाद (पेज-1)
हिसार (पेज-14)
नई दिल्ली (पेज-1)
रांची (पेज-1)
कश्मीरः दो आतंकी ढेर रायपुर (पेज-14)
बिलासपुर (पेज-9)
बस्तर (पेज-10)
नई दिल्ली (पेज-12)
वोटिंग के दौरान पथराव, पुलिस फायरिंग उदयपुर (पेज-6)
जयपुर (पेज-6)
जोधपुर (पेज-6)
कोटा (पेज-6)
बीएड की फर्जी डिग्री वाले 5 एजेंट गिरफ्तार जयपुर (पेज-2) जोधपुर (पेज-) शीर्षक में थोड़े बदलाव के साथ

*अध्ययन के लिए दैनिक भास्कर के ई-पेपर से 19 जनवरी, 2015 को विभिन्न संस्करणों के प्रथम व राष्ट्रीय खबरों के पृष्ट पर प्रकाशित कुछ खबरों को नमूने के तौर पर लिया गया है।

  1. http://www.exchange4media.com/58815_days-of-ban-on-media-over-says-ib-minister.html
  2. राष्ट्रीय सहारा, हस्तेक्षेप , 25 जनवरी 2014, कोरपोरेट सेसंरशिप ( अनिल चमड़िया) …..मीडिया के खिलाफ सेंसरशिप का सवाल एक खास तरह के राजनीतिक ढांचे से जुड़ा है। भारत में आपातकाल और उसकी तानाशाही को मीडिया में सेंसरशिप जैसे शब्द के जरिये समझने की कोशिश की जाती है। लेकिन सेसरशिप एक विचार है , महज किसी तरह की कार्रवाई का नाम नहीं है।घोषित आपातकाल नहीं हो तो भी सेसरशिप विभिन्न रूपों में जारी रह सकती है। विचार का तकनीकी विकास से भी रिश्ता नहीं होता है। पुरानी और नई तकनीक के साथ किसी भी तरह के विचार अपना रिश्ता बना लेते हैं।
  1. दैनिक भास्कर
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