‘बिरयानी’ का राजनीतिक संचार

“हिन्दी में एक ही शब्द है बड़े भाई। अंग्रेजी में दो तरह कहा जाता है- एक है ‘बिग ब्रदर’ और दूसरा ‘एल्डर ब्रदर’। जो बिग ब्रदर का एटीट्यूड है, वह एरोगेंस का प्रतीक होता है। इसीलिए उसे एरोगेन्ट कहते हैं। एल्डर ब्रदर केयरिंग होता और इसीलिए मैं यहां सदन में खड़े होकर कहना चाहूंगी कि भारत का एटीट्यूड हमारे पड़ोसी देशों के साथ ‘बिग ब्रदर’ का नहीं है, ‘एल्डर ब्रदर’ का है, जो भारत की संस्कृति है। भारत में बड़ा भाई बहुत केयर करने वाला, ध्यान रखने वाला होता है तो हम जब भी अपना एटीट्यूड रखेंगे, केवल एल्डर ब्रदर का रखेंगे, बिग ब्रदर का एटीट्यूड नहीं रखेंगे।”1 – सुषमा स्वराज

संविधान में संवैधानिक शासन के हर पहलू पर प्रकाश डाला गया है और इससे संबंधित कई संस्थाएं निर्मित की गई हैं। जब संवैधानिक शासन की एक पूरी योजना संविधान में मौजूद है तब वहां योजना आयोग का जिक्र क्यों नहीं है। इसे संवैधानिक संस्था के रूप में बनाने की जगह सिर्फ मंत्रिमंडल के प्रस्ताव से निर्मित किए जाने की पीछे कौन से राजनीतिक कारण थे उसकी पड़ताल जरूरी है। क्या इसे जानबूझकर एक असंवैधानिक संस्था बनाकर रखा गया ताकि उसके मार्फत अपरिभाषित भूमिकाओं और कामों की पूरी श्रृंखला खड़ी की जा सके? बाद में हुआ राजनीतिक विकास इस ओर इशारा करता है। योजना आयोग का निर्माण एक सीमित भूमिका के लिए किया गया था लेकिन क्रमश:  उसने अपनी भूमिका का विस्तार असीमित रूप से कर लिया। जिसका 15 मार्च के प्रस्ताव में कहीं उल्लेख भी नहीं था।

योजना आयोग के गठन के प्रस्ताव की शुरुआत में जहां राज्य के नीति-निर्देशक तत्व को उद्धृत किया गया है, वहां संसाधनों के लिए समुदायों के संसाधन पद का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन उसके आगे योजना आयोग के कार्यभार जब तय किए जा रहे हैं तो बार-बार देश के संसाधन पद का इस्तेमाल किया गया है। यानी समुदाय को देश के द्वारा बेदखल कर दिया गया। क्या यह मात्र संयोग है कि संविधान उद्धृत करने के फौरन बाद उसके एक महत्वपूर्ण पद में संशोधन कर दिया जाए।2

बिरयानी

जनसंचार माध्यमों के इस्तेमाल की योजना बेहद सूक्ष्म बातों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर शब्दों में अपने अर्थ भरे जाते हैं। जाहिर है कि सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर जिस समूह का वर्चस्व रहता है वह शब्दों में अपने अर्थ भरने और उसे जनसंचार माध्यमों के जरिये सामान्य अर्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता है। लिहाजा ये कहा जा सकता है कि जनसंचार माध्यमों के जरिये जब किसी एक शब्द को संप्रेषित (भेजा) किया जाता है तो दो स्तरों पर उस शब्द को अर्थ के लिए एक प्रक्रिया से गुजरना होता है। एक स्तर पर उस शब्द के एक अर्थ को निष्प्रभावी करने की कोशिश की जाती है और दूसरे स्तर पर उस शब्द के अपने अर्थों को निर्मित करने की कोशिश होती है। शब्दों में अर्थ भरने की यह पूरी प्रक्रिया राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक–सांस्कृतिक हितों से ही आखिरकार जुड़ी होती है। लोकसभा में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के वक्तव्य और संविधान में वर्णित राज्य के नीति-निदेशक तत्वों को समुदाय को योजना आयोग के गठन के प्रस्ताव में देश के रूप में परिवर्तित करना इसके दो उपरोक्त उदाहरण है।

शब्दों को नये अर्थ और नये संदर्भ में लिखे, पढ़े और सुने जाने की जो राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सांस्कृतिक प्रक्रिया निर्धारित करने की कोशिश की जाती है उस प्रक्रिया का विस्तार उसी के अनुकूल होता रहता है। मसलन योजना आयोग के कार्यभार तय करने के दौरान जिस समुदाय शब्द को देश शब्द में परिवर्तित किया गया उस देश शब्द को बाद में राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की एक प्रक्रिया देखी जाती है जो आखिरकार राष्ट्रवाद और उसकी पूरी राजनीतिक अवधारणा से जुड़ जाती है।

शब्दों में नये अर्थ भरने की प्रक्रिया अपने आप में नई नहीं होती है। वह प्रक्रिया दरअसल किसी शब्द को लेकर समाज में व्यवहार और अवचेतन के स्तर पर चलने वाले अर्थों से अपना सामंजस्य बनाकर ही पूरी की जाती है। किसी शब्द के अर्थ समाज में जो सामान्य तौर पर बरते जाते हैं लेकिन वह शब्द अपनी ऐतिहासिकता के कारण अवचेतन में एक भिन्न संदर्भ भी रखता है। यह अध्ययन का विषय है कि जब राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर परिवर्तन किए जाने की योजना को लागू किया जाता है तब शब्दों में नये अर्थों को भरने की प्रक्रिया तेजा होती है। दो दशकों (1995-2015) के दौरान जन संचार माध्यमों में जिन अर्थों के साथ नये शब्द सामान्य जनों में स्थापित किए गए हैं, उन शब्दों और उनके अर्थों का अध्ययन किया जा सकता है।

शब्द बदलाव की प्रक्रिया के प्रभावकारी और स्थायी महत्व के साधन होते हैं। शब्दों की अपनी श्रेणियां बनी हुई हैं। यानी हर विषय की एक खास तरह की शब्दावली होती है। ये भी कहा जा सकता है कि हर विषय के अपने शब्दकोश होते हैं। शब्दकोशों की तरह ही शब्दों में नये अर्थ की प्रक्रिया भी विभिन्न विषयों व क्षेत्रों के लिए भिन्न होती है।

भारतीय समाज में साम्प्रदायिकता की प्रक्रिया उसके अपने शब्दकोश तैयार करने की प्रक्रिया से जुड़ी हुई है। साम्प्रदायिकता की राजनीतिक प्रक्रिया का विस्तार बिबों, प्रतीकों के साथ शब्दों के प्रचारित-प्रसारित करने की प्रक्रिया से जुड़ा है। भारतीय मीडिया के संदर्भ में इस तरह के कई अध्ययन अब तक सामने आए हैं जिनमें जन संचार माध्यमों के साम्प्रदायिक भेदभाव करने व साम्प्रदायिकता की राजनीतिक प्रक्रिया को विस्तार देने में सक्रिय भूमिका स्पष्ट होती है। भारत का संविधान धर्म निरपेक्षता की विचारधारा का पक्षधर है और उसी के अनुरूप कानून एवं प्रशासन द्वारा साम्प्रदायिकता के प्रचार-प्रसार की कोशिशों को रोकने के लिए कार्रवाईयां की जाती हैं। जन संचार माध्यमों की साम्प्रदायिक भूमिका के आलोक में भी इन माध्यमों के लिए भी आचार संहिता तय की गई है। लेकिन जिस तरह से कानून एवं प्रशासन की कोशिशों के बावजूद साम्प्रदायिकता की राजनीति से जुड़े संगठन अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं उसी तरह से जन संचार माध्यमों ने भी अपनी साम्प्रदायिक भूमिका सुनिश्चित करने के इरादे से कई रास्ते विकसित किए हैं। इनमें बिंबों, प्रतीकों के साथ सामान्य तौर पर भिन्न अर्थों में प्रचलित शब्दों को नए साम्प्रदायिक अर्थों में स्थापित करने की कोशिश की गई है। ऐसे शब्द अध्ययन के विषय हैं।

यह अध्ययन एक शब्द ‘बिरयानी’ के संदर्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है।

भारतीय समाज के व्यंजन में बिरयानी की मांग का तेजी से विस्तार हुआ है। बिरयानी एक व्यंजन के अलावा अपनी ऐतिहासिकता के साथ विस्तार पाता है। यह ऐतिहासिकता इस रूप में संप्रेषित हैं कि यह मांसाहारी व्यंजन है। यह भारतीय व्यंजन नहीं है बल्कि भारत में उन देशों से आया एक लजीज व्यंजन हैं जहां इस्लाम धर्म को मानने वालों की बाहुल्यता रही है। व्यंजन के साथ बिरयानी को देखने का एक भिन्न नजरिया भी रहा है और उस नजरिये में एक सामाजिक- सांस्कृतिक आधार भी देखा जा सकता है।

मुबंई में 26 नंवबर 2008 (26/11) को आतंकवादी हमले की घटना का सिलसिला शुरू हुआ था और वह 29 नवंबर तक चला। इन हमलों में 164 लोगों के मारे जाने व 308 लोगों के घायल होने का दावा किया गया। मुबंई में इस हमले के बाद एक पाकिस्तानी नागरिक अजमल कसाब को गिरफ्तार किया गया और उसे उस हमले के लिए दोषी मानकर 21 नवंबर 2012 को पुणे की जेल में फांसी दी गई।

दुनिया के दूसरे हिस्सों की तरह भारत में फांसी विरोधी आंदोलन चलते रहे हैं। कसाब की फांसी की सजा के खिलाफ भी देश दुनिया में मानवाधिकार संगठनों ने आवाज उठाई। बेहद गरीब परिवार में पले-बढ़े अजमल कसाब की मुबंई में हमले की घटनाओं के सिलसिले में गिरफ्तारी के बावजूद उनके प्रति एक मानवीय दृष्टिकोण भी दिखाई देता है। मुबई में सरकारी वकील उज्जवल निकम के अनुसार न्यायालय में कसाब पर लगे आरोपों पर सुनवाई के दौरान जन संचार माध्यमों (मीडिया) की पैनी निगाह कसाब के हाव भाव पर लगी हुई थी। एक दिन सुनवाई के दौरान कसाब ने एक क्षण के लिए अपना सिर झुकाया और उसकी गर्दन ऊपर उठी तो वह रोते हुए दिखा। क्षण भर बाद ही टीवी चैनलों ने ब्रेक्रिंग न्यूज देनी शुरू कर दी – कसाब के आंखों में आंसू। उस दिन रक्षा बंधन था और टेलीविजन चैनलों के स्टूडियो में उस पर बातचीत होने लगी।

वकील उज्जवल निकम के अनुसार किसी ने ये अटकलें लगानी शुरू कर दी कि कसाब अपनी बहनों को याद करते हुए भावुक हो गया तो कुछ इस हद तक अपनी राय जाहिर करने लगे कि वह आतंकवादी है भी या नहीं। इस तरह की भावनाओं को तत्काल रोकना जरूरी था। तभी मैंने (उज्जवल निकम) मीडिया में ये बयान दिया कि कसाब जेल में मांसाहारी बिरयानी की मांग कर रहा था।3

उज्जवल निकम ने कसाब के पक्ष में मानवीय सहानुभूति और भावनाओं की आशंका के मद्देनजर मीडिया को कसाब द्वारा मांसाहारी बिरयानी की मांग किए जाने की कहानी गढ़ी और उसे जनसंचार माध्यमों में तेजी के साथ विस्तार मिला। इस पहलू के विश्लेषण से पहले इससे जुड़ा एक दूसरा तथ्य भी जनसंचार माध्यमों के व्यवहार को समझने के लिए गौरतलब है। उज्जवल निकम ने बिरयानी शब्द में जो उस क्षण एक नया अर्थ भरा और वह जिस अर्थों में स्थापित हुआ, उसका असर ये हुआ कि कसाब ने कभी बिरयानी की मांग नहीं की और कसाब ने जेल में कभी मांसाहारी भोजन नहीं किया, इस ठोस तथ्य को जनसंचार माध्यमों ने कोई अहमियत नहीं दी। उज्जवल निकम की  मनगंढ़त कहानी को झूठा बताने की कोशिश तत्काल जेल अधीक्षक एवं कसाब के वकील द्वारा वास्तविक  सूचना के जरिये की गई लेकिन उससे जनसंचार माध्यमों ने अपनी नजरें फेर ली।

सरकारी वकील उज्जवल निकम को कानून की कसौटी पर कसाब को सजा दिलाने की न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना था। लेकिन न्यायिक प्रक्रिया तमाम राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक प्रक्रिया का ही हिस्सा होता है। न्यायालयों में किसी आरोप के पक्ष-विपक्ष में सुनवाई अलग-थलग प्रक्रिया नहीं होती है। वह मौजूदा राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति से संबंद्ध होती है और वह न्यायिक प्रक्रिया के दौरान साथ-साथ चलती रहती है। उसका दबाव निरंतर उस न्यायिक प्रक्रिया पर होता है। सरकारी वकील उज्जवल निकम कसाब के प्रति मानवीय भावनाओं के सतह पर आने से न्यायिक प्रक्रिया में पड़ने वाले असर के प्रति सचेत थे। संसद भवन पर हमले (2001) के मामले में अफजल गुरू को फांसी समाज के एक बड़े समूह की भावनाओं के दबाब में दिया गया था।4 उज्जवल निकम कसाब के प्रति मानवीय भावनाओं के राजनीतिक आयामों के मद्देनजर एक ऐसी भावना को तेज करना चाहते थे जो कि निश्चल मानवीय भावनाओं पर भारी साबित हो सके। भारत में साम्प्रदायिकता के विस्तार से जुड़े अध्ययनों में ये बात उभरकर आती है कि मानवीय संबंधों व भावनाओं को किसी समूह की धार्मिक भावनाओं को उबारकर राजनीतिक तौर पर दबाया जा सकता है। साम्प्रदायिकता केवल राजनीतिक विषय नहीं है और भारत के संदर्भ में केवल संसदीय चुनाव में बहुमत हासिल करने की प्रक्रिया नहीं है। वह समस्त ढांचे का विषय है। ठीक इसी तरह साम्प्रदाकिता के लिए शब्दों का चयन और उल्लेख केवल संसदीय पार्टी के नेता या संसदीय चुनाव के लिए उम्मीदवार तक ही सीमित नहीं है। समस्त ढांचा और ढांचे के हिस्से इसका इस्तेमाल करते हैं। उस ढांचे में न्यायिक और कानूनी प्रक्रियाओं में लगी मशीनरी भी शामिल है। साम्प्रदाकिता जिस तरह से मानवीयता को खंडित करती है उसी तरह से मानव अधिकारों एवं लोकतंत्र की भावनाओं का भी साम्प्रदाकिता दमन करती है। मानव अधिकारों की चेतना और लोकतंत्र की भावनाओं को खंडित करने के लिए उस तरह के बिंबों, प्रतीकों व शब्दों का चयन किया जाता है जो साम्प्रदायिक भावनाओं को उभार सके। शब्दों के प्रचलित अर्थों को उसके ऐतिहासिक संदर्भों से विस्थापित किया जाता है।

सरकारी वकील उज्जवल निकम ने कसाब और बिरयानी के संबंधों का कोई तथ्यात्मक जुड़ाव स्थापित नहीं किया। बल्कि कसाब के पाकिस्तानी होने, पाकिस्तान के इस्लामिक राष्ट्र होने और बिरयानी के इस्लामिक देशों के व्यंजन और इस्लाम धर्म को मानेन वालों के मांसाहार होने की अवेचतन में जो जगह बनी है, उसका समुच्य बिरयानी के जरिये संप्रेषित किया। बिरयानी में अवचेतन में इस्लाम, पाकिस्तान, मुसलमान, मांसाहार, राष्ट्र विरोधी सभी को एक अर्थ के रूप में संप्रेषित करने की कोशिश की।

कसाब के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया की जिम्मेदारी का वहन करने वाले उज्जवल निकम ने बिरयानी को जिस रूप में स्थापित करने की कोशिश की उसका एक लंबा सिलसिला सा बनता दिखाई दिया। समुद्र तटों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार दल के डीआईजी बी. के. लोशाली ने एक पाकिस्तानी समुद्री जहाज को नेस्तनाबूत करने की इजाजत दे दी। उन्होंने पाकिस्तानी जहाज के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का पालन करने के बजाय उसे नेस्ताबूत करने के अपने फैसले को ये कहते हुए जायज ठहराया कि पाकिस्तानी समुद्री जहाज को उड़ाने का विकल्प (31 दिंसबर 2014) इसीलिए चुना क्योंकि वे पाकिस्तानियों को बिरयानी परोसना नहीं चाहते थे। भारत में इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान को लेकर जिस तरह की भावना का प्रसार हुआ है उस भावना को संगठित करने का एक बिंब बिरयानी के रूप में उज्जवल निकम ने जो स्थापित किया उसकी कड़ी समस्त ढांचे के विभिन्न हिस्सों में साम्प्रदायिकता के लिए चलने वाली प्रक्रियाओं से मिलती है। कसाब के रोने और उसके प्रति मानवीय भावनाओं के विरुद्ध एक व्यंजन बिरयानी को साम्प्रदायिक बिंब के रूप में जनसंचार माध्यमों के जरिये स्थापित करने की एक लंबी कड़ी बनती दिखाई दे रही है।

संदर्भ

  1. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का लोकसभा में बयान, 7 मई 2015
  2. योजना: निजीकरण बनाम लोकतंत्रीकरण, रविकिरन जैन/अंशु मालवीय, आजादी बचाओ आंदोलन प्रकाशन, (सितंबर 2014) पृष्ठ 5
  3. Ajmal Kasab preferred veg. food: Ex-jail chief, Mar 22, 2015, Age Correspondent, Mumbai

संदर्भ के लिए इसे भी देखें http://timesofindia.indiatimes.com/india/Will-anyone-tie-me-a-rakhi-Kasab-asks-lawyer/articleshow/4861656.cms  Will     anyone tie me a rakhi, Kasab asks lawyer Kartikeya, TNN | Aug 6, 2009, 11.40AM IST

  1. http://www.ibnlive.com/news/india/full-text-supreme-court-judgement-on-afzal-guru-589761.html

नोट : बिरयानी के राजनैतिक इस्मेताल पर विश्लेषणात्मक सामग्री के लिए इसे भी देखा जा सकता है।

A) http://www.ibnlive.com/news/india/ujjwal-nikam-2-975632.html

B)http://kafila.org/2013/02/04/ajmal-kasab-tajinder-pal-singh-bagga-biryani-and-me/

C)http://www.ndtv.com/blog/ujjwal-nikam-and-the-biryani-controversy-748843

D)http://www.asianage.com/columnists/hard-know-when-we-re-being-fed-psy-ops-biryani-285

(जनमीडिया के जून अंक में प्रकाशित अध्ययन)

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