एक पाठ्यक्रम, दो तरह की किताबें

गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, हिसार दूरवर्ती शिक्षा के जरिए मास कम्युनिकेशन में पोस्टग्रेजुएट (एम.ए) करवाता है। यूनिवर्सिटी को राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद् (नैक) से ए ग्रेड मिला हुआ है। मास कम्युनिकेशन एम.ए की परीक्षा हिंदी व अंग्रेजी दोनों में से किसी भी माध्यम में देने की सुविधा है। लेकिन यूनिवर्सिटी द्वारा छात्रों को जो पाठ्य सामग्री मुहैया करवाई जाती है वह सिर्फ अंग्रेजी में ही होती है। एम.ए हिंदी माध्यम से करे या अंग्रेजी माध्यम से करे, पाठ्य सामग्री सिर्फ अंग्रेजी में मुहैया करवाई जाती है। जब हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए परीक्षा हिंदी में देने की व्यवस्था है, तब हिंदी में पाठ्यसामग्री क्यों नहीं दी जाती।

हरियाणा के कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय को भी नैक से ए ग्रेड मिला हुआ है। इस यूनिवर्सिटी में मास कम्युनिकेशन में पोस्टग्रेजुएट (एम.ए) की पढ़ाई करवाई जाती है। इस विश्वविद्यालय में  भी  मास कम्युनिकेशन एम.ए की दूरवर्ती शिक्षा दी जाती है। एम.ए द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में मीडिया रिसर्च (शोध), डेवलपमेंट जर्नलिज्म (विकास पत्रकारिता), मीडिया प्रोडक्शन, पब्लिक रिलेशन (जनसंपर्क), एडिटिंग (संपादन) के पेपर शामिल हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पाठ्य सामग्री हिंदी और अंग्रेजी माध्यम दोनों में मिलती है। यहां मीडिया रिसर्च, विकास पत्रकारिता और मीडिया प्रोडक्शन की पाठ्य सामग्री का अध्ययन किया गया है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में मास कम्युनिकेशन एम.ए दूरवर्ती शिक्षा की फीस हिंदी व अंग्रेजी माध्यम दोनों के लिए एक समान है। दूरवर्ती शिक्षा के जरिए पढ़ाई करने वाले छात्रों को जो पाठ्य सामग्री मुहैया करवाई जाती है, ज्यादातर छात्र उसी पाठ्य सामग्री पर ही निर्भर रहते हैं और उस सामग्री को पढ़कर ही परीक्षा देते हैं।

विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी माध्यम और अंग्रेजी माध्यम के छात्रों को दी जाने वाली पाठ्य सामग्री का अंतर्वस्तु विश्लेषण एक अध्ययन का विषय हो सकता है। लेकिन इस अध्ययन की सीमा यह है कि हिंदी माध्यम की पाठ्यसामग्री में किस तरह से अंग्रेजी माध्यम की पाठ्य सामग्री के मुकाबले कम अध्याय और विषय होते हैं।

यूनिवर्सिटी से एक ही विषय में मिलने वाली पाठ्य सामग्री में अंतर देखने को मिलता है। एक ही विषय की अंग्रेजी में पाठ्य सामग्री में अधिक अध्याय होते है जबकि हिंदी की पाठ्य सामग्री में अंग्रेजी के मुकाबले कम अध्याय होते हैं। अध्यायों में भी अंग्रेजी के मुकाबले हिन्दी में कम सामग्री होती है। कम होने का अर्थ यह है कि हिन्दी की पाठ्य सामग्री में कई टॉपिक गायब होते हैं।

मीडिया रिसर्च की पाठ्य सामग्री में हिंदी और अंग्रेजी में अंतर इससे स्पष्ट होता है कि मीडिया रिसर्च की अंग्रेजी की पाठ्यसामग्री में 8 अध्याय है जबकि हिंदी की पाठ्य सामग्री में सिर्फ 5 अध्याय है। 3 अध्याय जो हिंदी की पाठ्यसामग्री में नहीं है।

  • Data Analysis technique- Coding and Tabulation, statistical Analysis- univariate, Bivariate, Multivariate, Mean, Median and Mode
  • Measurement, Reliability and Validity, Statistical Method in Media research
  • Research report, Problem in Media Research, media Research as a tool of reporting

दूसरा,  हिंदी माध्यम की पाठ्य सामग्री में 3 अध्याय के साथ ही कई सारे टॉपिक भी नहीं दिए गए हैं, जोकि अंग्रेजी की पाठ्य सामग्री में दिए गए हैं।

हिंदी माध्यम में ये सामग्री (टॉपिक) नहीं हैं

  • Operational definition of variables
  • Nature of Measurement
  • Discrete and Continuous Variable
  • Guttman Scaling and Semantic differential  scale
  • Functional areas of advertising research
  • Stages in advertising research
  • Psychographic  studies
  • Lifestyle segmentation research
  • Audience research
  • Research Design
  • Categories of sampling (defined)
  • Handling data
  • Area of research
  • Databases
  • Readership Survey
  • gauging Public Opinion
  • Tabulation and analysis

विकास पत्रकारिता की हिंदी व अंग्रेजी में मिलने वाली पाठ्य सामग्री को देखा जा सकता है। विकास पत्रकारिता की हिंदी माध्यम की पाठ्य सामग्री में सिर्फ 2 अध्याय ही है जबकि अंग्रेजी माध्यम की पाठ्य सामग्री में 11 अध्याय है। हिंदी माध्यम की पाठ्य सामग्री में 57 पृष्ठ ही है, जबकि अंग्रेजी माध्यम की पाठ्य सामग्री में 223 पृष्ठ हैं।

हिंदी माध्यम में 9 अध्याय नहीं दिए गए

  • Development Communication
  • Social and Economic Issues in Development
  • Upliftment of Weaker Sections, Education & Literacy, Poverty Allevation Programmes
  • Environment, Unemployment, Human Rights, Health and Hygiene
  • Role of Various Sectors in Development, Civil Society, National and International Bodies in development
  • Media Used for Development Communication
  • Rural Development – Concept
  • Communication and Urbanization: Role of Communication in Urbanization, Problems and Impact of Urbanization and Population Migration
  • Role of Communication  relating to Environment

इसी तरह, मीडिया प्रोडक्शन की पाठ्य सामग्री में भी हिंदी माध्यम में अंग्रेजी माध्यम के अपेक्षा कम अध्याय दिए गए हैं। अंग्रेजी की पाठ्य सामग्री की तुलना में हिंदी की पाठ्य सामग्री में 2 अध्याय कम दिए गए है।  हिंदी माध्यम की पाठ्य सामग्री में पृष्ठ 206 ही है, जबकि अंग्रेजी माध्यम की पाठ्य सामग्री में 272 पृष्ठ है। ये दो अध्याय हिंदी की पाठ्यसामग्री में नहीं दिए गए है।

  • software: Computer Graphics, Multimedia, PageMaker
  • Radio Features & radio Drama

साथ ही कुछ टॉपिक जैसे teleconferencing, teletext, radio text , video text, Announcing for the Electronic media, Announcer as communicator, principles of effective communication, terminology हिंदी की पाठ्यसामग्री में नहीं दिए गए है। अंग्रेजी की पाठ्य सामग्री में फोटोग्राफीः अर्थ एवं कैमरे की विकास यात्रा अध्याय नहीं दिया गया है।

इस विश्वविद्यालय में भी उच्च शिक्षा के लिए अन्य राज्यों से बच्चे पढ़ने आते हैं। जिनकी पढ़ाई का माध्यम हिंदी होता है। जब उन बच्चों को हिंदी माध्यम में उपयुक्त पाठ्यसामग्री नहीं मिलेगी तब उनका परीक्षा में प्रर्दशन में भी खराब ही होगा। भाषा का भविष्य में प्रेमपाल शर्मा लिखते है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अधीन लगभग 80 कॉलेज आते हैं। 20 कॉलेजों को छोड़कर कम से कम 60 कॉलेज ऐसे कहे जा सकते हैं जो कि परिधि के हैं यानि कि जिनमें ज्यादातर बच्चे उत्तरप्रदेश, बिहार या राजस्थान जैसे उन प्रांतों से आए होते हैं जहां हिन्दी माध्यम से पढ़ाई होती है। इतिहास, राजनीति शास्त्र, सामाजिक विज्ञान, मनोविज्ञान जैसे विषय हैं जिनमें 50 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे हिन्दी माध्यम में ग्रेजुएशन की परीक्षा देते हैं। भले ही उन्हें शिक्षक हिन्दी माध्यम में पूरी तरह न पढ़ाते हों लेकिन परीक्षा में उनकी अभिव्यक्ति इन विषयों में हिन्दी माध्यम में ज्यादा बेहतर ढंग से सामने आती हैं। लेकिन दिल्ली के विश्वविद्यालयों के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में हिन्दी माध्यम के लिए जगह बहुत कम बची है।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों से फीस तो अंग्रेजी माध्यम के बराबर ली जाती है, लेकिन हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों को यूनिवर्सिटी उपयुक्त पाठ्य सामग्री मुहैया नहीं करवाती है। एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि अब स्नातकोत्तर के स्तर पर हिंदी माध्यम की जगह कम होती जा रही है। जब ‘ए’ ग्रेड यूनिवर्सिटी में छात्रों को इस तरह की पाठ्य सामग्री दी जाती है, तब अन्य यूनिवर्सिटियों की पाठ्य सामग्री का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह महज छात्रों के साथ भाषायी आधार पर भेदभाव ही नहीं है। पाठ्यक्रम समाज निर्माण के पूरे कार्यक्रम के हिस्से होते हैं। भाषायी आधार पर भेदभाव को एक सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक वर्ग के साथ भेदभाव के परिपेक्ष्य में देखा जाता है। भावी समाज में उस वर्ग की भागेदारी और उस भागेदारी की स्थिति को स्पष्ट करती है। यह यूनिवर्सिटी महज एक नमूना अध्ययन है। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों या राज्य विश्वविद्यालयों की दूरवर्ती शिक्षा की पाठ्य सामग्री में इस तरह के भेदभाव देखने को मिल सकते हैं।

 

जनमीडिया के अक्टूबर अंक में प्रकाशित अध्ययन

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