न्यूज चैनल हर घंटे कश्मीर को भारत से दूर ढकेल रहे हैं

शाह फैसल

मेरे एक साल के बच्चे के लिए 13 जुलाई 2016 की दोपहर में सोना मुहाल हो गया था। इलाके में कर्फ्यू लगा था और नजदीक की सड़क पर तड़के से ही आजादी के नारों और आंसू गैस के गोलों के धमाकों की भयावह जुगलबंदी चल रही थी। संघर्ष के क्षेत्र में हिंसा से परिचय बच्चे की शिक्षा का हिस्सा होता है। इस पल मेरे बच्चे पर कश्मीरी होने का का ठप्पा लगाया जा रहा था। खतना होने और आधिकारिक तौर पर मुस्लिम करार दिए जाने से पहले ही उसके कोमल दिमाग पर इतिहास अंकित हो रहा था। उसके अवचेतन पर इस्लाम से भी पहले कश्मीर ने दस्तक दे दी थी। तीन दशक पहले कुछ ऐसे ही पलों में हमारे घर के पिछवाड़े पहाड़ियों पर मोर्टार के गोलों की बरसात हो रही थी और मेरे पिता सुलाने के लिए मुझे थपकियां दे रहे थे। उस दोपहर एक दफा फिर घाटी के अतीत और वर्तमान का पूर्व परिचित खूनी मिलन हो रहा था। मौका 85वां शहीद दिवस का था। मगर इस बार सड़कों पर अशांति की शुरुआत असामान्य थी। इस अशांति के लिए चिंगारी का काम 8 जुलाई 2016 को कोकरनाग में एक नौजवान उग्रवादी कमांडर की मौत ने किया था।

उसी वक्त किसी अनजान शख्स ने टेलीफोन पर मुझे बताया कि जी न्यूज कश्मीर के मौजूदा संकट पर दो दिनों से मैराथन चर्चा चला रहा है। वह कश्मीर के मृत और जीवित नौजवान उग्रवादियों के बरक्स मेरी तस्वीरों और वीडियो को आदर्श के तौर पर पेश कर रहा था। मैं काफी परेशान हो गया। इसकी वजह सिर्फ इस समाचार चैनल की असंवेदनशील और छिछला तौर-तरीका ही नहीं था। उसकी इस करतूत ने मेरी जान को भी जोखिम में डाल दिया था। मुझे हैरानी थी कि 50 हजार रुपल्ली की मासिक पगार और 50 लाख रुपये के मकान के कर्ज के साथ मैं कश्मीरी युवाओं की कामयाबी की मिसाल कैसे हो सकता था।

कश्मीर में महानता का एकमात्र पैमाना आपके जनाजे में शामिल लोगों की संख्या है। ऐसे में कोई भी 50 हजार रुपये के लिए अलग-थलग पड़ कर मरना क्यों चाहेगा। मेरा भय सही साबित हुआ। मुझे बताया गया कि हमारे मुहल्ले के बाहर भारी भीड़ जमा है। भीड़ में शामिल लोग जी न्यूज के एंकर की इस टिप्पणी से नाराज थे कि मृत उग्रवादियों को भारत की धरती में दफनाने की बजाय कूड़े के साथ जला दिया जाना चाहिए। स्टूडियो और सड़क उन्माद में एक-दूसरे से होड़ कर रहे थे।

अगले दिन मैं कुर्ता-पायजामा और किसानों जैसी टोपी में अपनी पहचान छिपाए दफ्तर के लिए  निकला। मैं जांच चैकियों से चोरों की तरह निकल रहा था। मैं जानता था कि नाराज नौजवानों के किसी झुंड ने मुझे पहचान लिया तो मेरी खैर नहीं है। आखिर मैं इस नाजुक मोड़ पर कश्मीरी और भारतीय के बीच होड़ में गलत पाले में जो पड़ गया था। मेरे फेसबुक वॉल पर हुई मेरी लानत-मलानत मेरे इस डर की तस्दीक कर रही थी।

पिछले कुछ बरसों से राष्ट्रीय मीडिया का एक तबका एक व्यावसायिक रणनीति के तहत भारत की अवधारणा को कश्मीर में गलत ढंग से पेश कर रहा है। वह देश के बाकी हिस्सों में भी कश्मीर के बारे में झूठ फैला रहा है। इस बहस के झुकाव और समय को लेकर हैरानी की बात कुछ भी नहीं है। वह 2008-2010 और 2014 में भी ऐसा ही कर चुका है। मौजूदा समय में कश्मीर पर लगभग सभी कार्यक्रमों का मकसद अवाम में उत्तेजना फैलाना है। इस मनमाने कवरेज के पीछे का इरादा राज्य सरकार के लिए परेशानियों को बढ़ाना लगता है। इसके विपरीत प्रिंट मीडिया ने अपना संतुलन हमेशा बनाए रखा है।

इन कुछेक समाचार चैनलों की व्यावसायिक क्रूरता वाकई बेहद दुखद है। लोग मर रहे हैं और सरकार अवाम की भावनाओं को शांत करने की पुरजोर कोशिश में लगी है। लेकिन ये चैनल लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की सरासर अनदेखी करते हुए झूठ को बढ़ावा देकर नागरिकों को बांटने और नफरत फैलाने में जुटे हैं। शांति की अपीलों का भी इनकी मुहिम पर कोई असर नहीं पड़ता। टीआरपी को राष्ट्रीय हित के तौर पर बेचने और नौजवानों की लाशों पर कारोबार करने की यह बेशर्मी इन भद्दे न्यूज रूमों का सबसे गंदा पहलू है।

कश्मीर को परे हटा कर देखें तो भी भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय हितों को राष्ट्रीय मीडिया से आजाद कराने तथा पड़ोसियों और अवाम के साथ संवाद की बहाली की है। मुझे यह कहते हुए जरा भी हिचक नहीं है कि जी न्यूज, टाइम्स नाउ, न्यूज एक्स और आजतक उस मुहिम की अगुवाई करते हैं, जो भारत को संवाद पर आधारित सभ्यता से एक मूर्खतापूर्ण और अतार्किक समाज में तब्दील कर देगा।

भारतीय परंपरा के अनुसार राजसत्ता का जनता से संवाद उग्रता और हिंसा के बजाय आपसी समझ और कल्याण के जरिये होना चाहिए। सम्राट अशोक ने अपनी प्रजा के साथ संवाद के लिए स्तंभों और शिलालेखों का सहारा लिया था। मुगलकाल में भी दीवाने आम राजसत्ता और रियाया के बीच सीधे संवाद का प्रतीक था। फरमान आज की तरह भांड़ और चारण नहीं बल्कि सिर्फ शासक ही जारी कर सकता था। इस्लामी परंपरा में भी संवाद के केंद्र में सच्चाई, संयम और लगन ही है। भारतीय और इस्लामी अनुभूतियों के संगम कश्मीर को भी ईमानदारी, सच्चाई और बेबाकी की दरकार है। समाज को बांटने वाला संवाद भारत के हितों को ही और कमजोर करेगा।

मौजूदा अशांति के कारणों की पड़ताल करते समय हमें इस पर भी गौर करना चाहिए कि किस तरह हमने संवाद को सिर्फ उकसाने और अलगाव फैलाने में दिलचस्पी रखने वाले टेलीविजन चैनलों के हवाले कर दिया है। भारतीय शासन कश्मीर को बौद्धिक गद्दारों, राजनीतिक दलबदलुओं, अवसरवादियों, खुफिया एजेंसियों और राष्ट्रीय हित के स्वघोषित पहरेदारों के हाथों में छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकता।

कश्मीरियों के लिए राष्ट्रीय मीडिया की घृणित संपादकीय नीति और सरकार की दमनकारी नीतियों में फर्क कर पाना अक्सर कठिन होता है। टेलीविजन चर्चाओं में कश्मीर के प्रतिनिधियों पर धौंस जमाया जाना, कश्मीरियों की आकांक्षाओं का मजाक उड़ाना और उनकी परेशानियों को शोर-शराबे में दबा देना आम बात है। टीवी चैनल बेगुनाहों के कत्ल पर मामूली मुद्दों को तरजीह देने के अलावा आम आदमी की पीड़ा को दिखाने के बजाय सैनिकों की बहादुरी का गुणगान  करते हैं। राज्य सरकार की सकारात्मक पहलकदमियों को नजरंदाज करने वाले ये चैनल सच को नहीं दिखाते और इन पर कश्मीरी जनता की तुलना में गाय को ज्यादा महत्व दिया जाता है। ऐसे में कश्मीरियों की निराशा और भारत के खिलाफ नाराजगी स्वाभाविक है। प्राइम टाइम टेलीविजन समाचारों के आक्रमण का हर घंटा कश्मीर को भारत से एक मील पश्चिम की ओर खिसका देता है।

संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मिली गारंटी की वजह से नफरत की पत्रकारिता के इन ठेकेदारों का मुंह बंद करना या इनके खिलाफ हस्तक्षेप करना आसान नहीं है। लेकिन देश की एकता और अखंडता का मसला इससे कहीं बहुत बड़ा है। हमें दिल्ली और श्रीनगर के बीच संवाद के मूल, पारंपरिक और अतिरिक्त माध्यमों को बहाल करना होगा, जो शोर-शराबे और नाराजगी को घटा कर न्यूजरूम राष्ट्रवादको अप्रासंगिक बना सके। इसके अलावा हमें इन मीडिया घरानों को समझाना होगा कि उन्हें जमीनी हकीकत पर गौर करते हुए अपने युद्धोन्मादी आडंबर को घटाना चाहिए।

श्रीनगर के युवा आपको बता सकते हैं कि भारत किस तरह पिछले बरसों में कश्मीरियों से धांधली प्रभावित चुनावों, निर्वाचित सरकारों की बर्खास्तगी, मुठभेड़ों और भ्रष्टाचार के जरिये संवाद करता रहा है। वे बताएंगे कि किस तरह भारत सेना के बंकर, पुलिस की गाड़ी या प्राइम टाइम टेलीविजन पर गरजने वाले लफ्फेबाजों का पर्यायवाची बन गया है। क्या इस तरह का भारत कश्मीरी दिलों को जीत सकता है। कश्मीरी अवाम भारत और उसके प्रतीकों को किस नजर से देखती है उसे स्वीकार करना इस पेचीदा पहेली को हल करने की दिशा में पहला कदम होगा।

कश्मीरी बहुत संवेदनशील होते हैं। इसके अलावा संदेह करना भी उनकी फितरत है। उनसे बातचीत गर्मजोशी के माहौल में और अहसान के बजाय बराबरी के स्तर पर हो, तभी वह कामयाब होगी। मौजूदा प्रधानमंत्री ने अकेले दम पर दुनिया भर में भारत की छवि को रौशन किया है। उन्हें कश्मीर में भारत की छवि बदलने का काम भी अपने हाथों में लेना चाहिए।

लेखक- भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और जम्मू कश्मीर में स्कूली शिक्षा के निदेशक हैं।

अंग्रेजी से अनुवाद- पार्थिव कुमार

जनमीडिया के सितम्बर अंक में प्रकाशित लेख

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