दक्षिण एशिया में शांति के प्रयास और मीडिया

दक्षिण एशिया में शांति को बढ़ावा देने में मीडिया की भूमिका विषय पर चंडीगढ़ में 8-12 अप्रैल 2016 को आयोजित सेमिनार में दिया गया भाषण

    प्रबोध जमवाल

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत और पाकिस्तान के मीडिया, जिसमें खबरिया चैनल भी शामिल हैं, ने दक्षिण एशियाई देशों में शांति एवं लोकतंत्र की भावना को बढ़ावा देने में अवरोधक की भूमिका निभाई है। शांति के प्रयासों को बढ़ावा देने की बजाय मीडिया की भूमिका अंधराष्ट्रवाद की आग में घी डालने वाली है। असल में, भारत और पाकिस्तान में आतंकवाद संबंधी कुछ घटनाओं में मीडिया ने अति राष्ट्रवादी ताकतों के जाल में फंसकर जिम्मेदारीपूर्ण रिपोर्टिंग से किनारा कर लिया है। यह कोई नई प्रवृत्ति या घटना नहीं है और न ही यह सिर्फ दक्षिण एशियाई देशों तक सीमित है।

दुखद यह है कि अंधराष्ट्रवादी तरीके से काम करने की वजह से मीडिया भारतीय और पाकिस्तानी सरकारों के हाथों का एक औजार बन गया है। मौजूदा हालात में दोनों देश और अति-राष्ट्रवादी ताकतें मीडिया का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हित साधने तथा संकीर्ण राजनीति को बढ़ावा देने में करते हैं। ज्यादातर मामलों में दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी राजनीतिक दल, जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं। ये राजनीतिक दल सामाजिक और आर्थिक विकास के मुद्दों का इस्तेमाल भी अपने हित साधने में करते हैं। इन परिस्थितियों के चलते दक्षिण एशिया में गरीबी और असल विकास जैसे सभी बड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग का दायरा सिमटता जा रहा है। लोकहित के लिए स्वतंत्र अखबारों का काम करना दुभर हो गया है। यह बताना मुनासिब होगा कि जो पत्रकार शांति प्रक्रिया के लिए सक्रिय और सही मायने में शामिल हैं और मैत्रीपूर्ण रिश्तों को बढ़ावा देकर दोनों तरफ सामाजिक उत्साहवर्द्धन कर रहे हैं, उनके लिए स्वतंत्र रूप से अपना दायित्व निभाने में मुश्किलें आ रही हैं।

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यहां कुछ घटनाओं का जिक्र करना जरूरी है। 2008 में 26/11 मुंबई हमले में भारत और पाकिस्तान की मीडिया रिपोर्टिंग बहुत संकीर्ण थी। दोनों देशों का मीडिया अंधराष्ट्रवाद में डूबकर इस मामले को रिपोर्ट कर रहा था। जैसे लग रहा था कि दोनों देश मीडिया के जरिये युद्ध लड़ रहे हैं। इसी तरह पठानकोट एयरबेस पर हमले के दौरान 1 जनवरी 2016 के दिन मीडिया एक बार फिर इसी जाल में फंस गया। भारत की कई सुरक्षा एंजेसियों की भूमिका संदेहास्पद रही है। कुछ ही मीडिया समूह ऐसे हैं जो घटना की जांच खुद करते हैं। इस मुद्दे पर सूचना और पठानकोट हमले की विस्तृत जानकारी के लिए सुरक्षा एजेंसियों पर खालिस निर्भरता को लेकर मीडिया की तीखी आलोचना हुई। सुरक्षा प्रतिष्ठानों ने पत्रकारों को गलत जानकारी दी।

पत्रकार इसी समाज का हिस्सा होते हैं। ऐसी स्थिति में ज्यादातर पत्रकारों के लिए पीछे हटना मुश्किल होता है और उसको बड़े परिप्रेक्ष्य में देखने लगते हैं, खासकर जब उनके देश पर हमला हुआ हो। पत्रकारों की जिम्मेदारीपूर्ण रिपोर्टिंग और टिप्पणी में उनके विचार व राजनीतिक सोच तो झलकती है लेकिन कम से कम हम उम्मीद कर सकते हैं कि वह अपने विषय, अपने दर्शकों/पाठकों के साथ न्याय करेंगे। और शायद राष्ट्रीय पहचान की बजाय मानवता को प्रमुखता देंगे। भारतीय और पाकिस्तानी पत्रकारों की आलोचना करते हुए रीता मनचंदा का कहना है कि मीडिया में किसी मुद्दे के साथ जोड़-तोड़ प्रत्यक्ष सेंसरशिप से ज्यादा मिथकों और अपनी सोच का घालमेल है।

यदि भारतीय मीडिया राष्ट्रवादी है और अपनी सरकार पर भरोसा करता है तो पाकिस्तान की सरकार के नुमाइंदों ने भी पाकिस्तानी मीडिया का मुंह तोड़ देने के लिए उन पाकिस्तानियों को उकसाया जिनकी प्रवृत्ति नुक्ताचीनी की है। पाकिस्तान के मीडिया की सीमाओं को भी पेशावर के अनुभवी पत्रकार रहिमुल्ला युसूफजई के इस कथन से भी समझा जा सकता है। युसूफजई के अनुसार पाकिस्तानी पत्रकारों को पेशेवर तरीके से 1965 और 1971 के युद्धों और कच्छ के रण विवाद तथा कारगिल युद्ध को कवर करने का अवसर नहीं मिला। बलूचिस्तान के संघर्ष और उत्तरी क्षेत्रों को भी कवर करने का मौका नहीं मिला।

इसी प्रकार, टेलीविजन चैनलों पर बातचीत के दौरान एंकर युद्धोन्मादी बात करते हैं, जिसे आप चुनौती नहीं दे सकते। हाल ही का एक उदाहरण बताते हैं, एक सेवानिवृत्त आर्मी जनरल ने भारत का उल्लेख पाकिस्तान के दुश्मन मुल्क के तौर पर किया। खबरिया चैनलों में संतुलित बात करने वाले टिप्पणीकारों को बुलाया तो जरूर जाता है, लेकिन उन्हें बोलने का मौका बहुत कम दिया जाता है। विश्लेषक फोकिया सादिक खान कहते हैं कि पाकिस्तानी मीडिया उस चीज को जरूर दिखाता है जिसमें फिल्मकार महेश भट्ट भारतीय मीडिया की आलोचना करते हैं, लेकिन वह अपने ही मुल्क में हो रहे पाकिस्तानी मीडिया की आलोचना को कभी नहीं दिखाता है। पाकिस्तानी मीडिया मुस्लिम होने के कारण मुंबई में फ्लैट नहीं मिलने पर शबाना आजमी का बयान चलाता है लेकिन रूढ़िवाद पर उनकी राय नहीं लेता है।

बाबरी मस्जिद का विध्वंस, परमाणु परीक्षण और कारगिल लड़ाई के दौरान दोनों तरफ से अंधराष्ट्रवादी पत्रकारिता हुई। कभी-कभी पत्रकारों की चूक आयोग की चूक से ज्यादा दोषपूर्ण होती है- जैसे कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं की अनदेखी करना, कुछ पहलुओं को कम करके दिखाना और महत्वपूर्ण सवालों को नहीं पूछना।

मुंबई हमले की भयावह घटना से हुए अनुभव के कई उदाहरण हैं। कल्पना शर्मा तहलका में भारतीय मीडिया की पहले 60 घंटों की कवरेज की आलोचना करते हुए कई दृश्यों को खोलती हैं। वह लिखती हैं, “यह जरूरी है कि पत्रकारों को असाधारण स्थितियों को कवर करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाए और वे संयम के महत्व को सीख सकें तथा तथ्यों की दोबारा जांच कर सकें… पेशेवर रुख और सटीकता ही यह सुनिश्चित करेगी कि हम पूर्वाग्रह और अफरा-तफरी बढ़ाने वाले तत्वों का साथ तो नहीं दे रहे हैं।”

कुछ भारतीय चैनल पाकिस्तानी फैक्टर दिखाने के लिए फिल्म का ट्रेलर चलाते हैं। यह स्पष्ट रूप से पाकिस्तान की नाराजगी को बढ़ाता है। हालांकि भारतीयों के दर्द और दुख को महसूस करने वाले पाकिस्तानियों को दिखाकर इस नाराजगी को संयमित किया जा सकता है। टिप्पणीकार उस समय को याद कर सकते हैं, जब उनके मीडिया घरानों ने उस मुद्दे को किस तरह सनसनीखेज बनाया था।

पत्रकार यह तर्क दे सकते हैं कि वे सिर्फ संदेशवाहक हैं और सरकार व जनता की राय को दिखाते हैं। लेकिन मीडिया हमेशा सवाल उठता है और लोग उस पर सोचते हैं। हमारे परमाणु हथियारों से लैस देशों में 9/11 के बाद जहां बड़े खिलाड़ी हथियारों के खेल में शामिल रहे हैं और अलकायदा तथा तालिबान की विचारधारा को खड़ा करने वाली दुनिया के इर्द-गिर्द सोचने के लिए हमें प्रशिक्षित किया गया।

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जहां तक, मेरे अखबार का मामला है कश्मीर टाइम्स प्रकाशन, वह जम्मू-कश्मीर में अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं के चार अखबारों का प्रकाशन करता है। यह प्रकाशन शुरू से ही स्वतंत्र रिपोर्टिंग को बढ़ावा देने, सभी तरह की हिंसक घटनाओं की जांच पड़ताल, शांति प्रक्रिया को बढ़ावा देने का काम करता रहा है और समतावादी समाज के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन जब से इसकी शुरुआत हुई है यह भारतीय सरकार के निशाने पर है। संस्था द्वारा एक संघीय लोकतांत्रिक देश की कल्पना की गई, जहां विकेन्द्रित लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सिर्फ असहमति को जगह ही नहीं दी जाती है बल्कि उसका सम्मान भी किया जाता है। जीवंत लोकतंत्र में देश के लोगों को विचार-विमर्श के माध्यम से बहस करने के लिए जगह दी जाती है।

अति राष्ट्रवादी ताकतें, संकीर्ण सोच वाले दक्षिणपंथी समूह इन सिद्धांतों और वसूलों को निशाना बना रहे हैं। सरकार की ओर से स्वतंत्र आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। भारत और पाकिस्तान के बीच शांति को बढ़ावा देने, नियंत्रण रेखा पर कुछ और रास्तों को खोलने ताकि लोगों के बीच संपर्क-संबंध बढ़ें तथा विभाजित कश्मीर के दोनों हिस्सों के बीच व्यापार हो सके, इसके मद्देनजर अक्टूबर 2004 में कश्मीर टाइम्स प्रकाशन के पत्रकार पहली बार पाकिस्तानी मीडिया के प्रतिनिधियों से मिले थे। लेकिन तभी से भारत सरकार की तरफ से कश्मीर टाइम्स प्रकाशन को मिलने वाले वाजिब सरकारी विज्ञापनों से इसे मरहूम कर दिया गया है।

कश्मीर टाइम्स प्रकाशन ने 2011 में भारत-पाकित्सान के बीच व्यापक बातचीत को फिर शुरू करने का एक प्रयास किया, ताकि दक्षिण एशियाई देशों में शांति और लोकतांत्रिक हितों को बढ़ावा दिया जा सके। लेकिन इस प्रकाशन को निशाना बनाया गया और यह प्रवृत्ति निरंतर बनी हुई है। भारत सरकार ने अभी तक विज्ञापन की सूची से सिर्फ कश्मीर टाइम्स प्रकाशन को ही बाहर रखा हुआ है।

*प्रबोध जमवाल, 1999 से कश्मीर टाइम्स प्रकाशन के संपादक हैं। वह पाकिस्तान-इंडिया फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी (पीआईएफएफपीडी) में तब से सक्रिय हैं जब इसकी स्थापना 1993 में हुई थी। वह 2000 में स्थापित साउथ एशियन फ्री मीडिया एसोसिएशन (साफमा) के संस्थापक सदस्य हैं।

*अंग्रेजी से अनुवाद- संजय कुमार बलौदिया (जनमीडिया के सितम्बर 2016 अंक में प्रकाशित भाषण)

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